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कौन आगे और कौन पीछे KAUN AAGE AUR KAUN PEECHHE

आपने खिलाड़ियों को दौड़ते हुए देखा होगा। इस दौड़ में जीत उसी की होती है जो दौड़ में आगे निकल जाता है। दौड़ जब लम्बी होती है तो धावक को ट्रैक (जिसमें खिलाड़ी दौड़ता है) के कई चक्कर लगाने पडते हैं। इस दौड़ में कौन आगे निकल जायेगा कुछ कहा नहीं जा सकता है। कभी कोई आगे और कभी कोई आगे यह सब चलता रहता है। अन्त में जो सबसे आगे निकल जाता है जीत उसी की होती है।              मनुष्य का जीवन भी एक लम्बी दौड़ की तरह है। जीवन की इस दौड़ में हर कोई आगे निकलने का प्रयास कर रहा है। दर्शक-समाज को कभी कोई आगे निकलता दिखाई देता है और कभी कोई। इस दौड़ में, हमें जिससे आत्मीयता होती है उसे आगे निकलता देखकर हम खुश होते हैं और दूसरा कोई आगे निकलता है तो हम उदास हो जाते हैं। यह मानव स्वभाव है।                 ईश्वर ने हमें बहुत कुछ दिया है लेकिन सबकुछ नहीं दिया है। किसी को ज्ञान दिया है तो उसे धन नहीं दिया। किसी को स्वर दिया है तो उसे सुन्दरता नहीं दी। ईश्वर ने जो कुछ भी किया है हमारे भले के लिए किया है। उसने ना हमें कोई सजा दी है और ...

गैर बने अपने GAIR BANE APNE

समय के साथ साथ हमारे जीवन में बदलाव होता रहता है। परिस्थितियां बदलती हैं तो हमारी विचाधारा भी बदल जाती है। जो व्यक्ति हमें बुरा लगता था  परिस्थितियों वश वही व्यक्ति हमें अच्छा लगने लगता है। जिंदगी भी अजीब है इसमें कब कौन सा मोड़ आ जाये निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस संघर्षपूर्ण जीवन में मनुष्य जीवन पथ के मोड़ों से गुजरते हुए आगे बढ़ता रहता है। यही जिंदगी है।              एक आम आदमी के मन में अपने-पराये, मित्र-शत्रु की सोच होती ही है लेकिन जिस इंसान का आत्मिक विकास हो गया हो या यूँ कहें जिसमें समता का भाव आ गया हो उसके लिए तो सभी अपने होते हैं कोई पराया नहीं होता है। ऐसा इंसान अपने जीवन में सदा सुखी रहता है । लेकिन ऐसे इंसान समाज में बहुत कम होते हैं।              इस लेख में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि किन कारणों से गैर भी अपने बन जाते हैं और उनका हमारे प्रति पहले से अच्छा बर्ताव हो जाता है।             आज के इस भौतिकवादी युग में हर भलाई बुराई की जड़ पैसा है। जहाँ आदमी...

मानव जीवन में दिखावे का महत्व MAANAV JEEVAN MEIN DIKHAVE KA MAHATAV

परिवर्तन प्रकृति का आवश्यक नियम है। कभी जाड़ा, कभी गर्मी तो कभी बरसात होती है। पेड़ पौधों में भी परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। पेड़ पौधे समय से फूलते फलते हैं। इसी तरह समाज में भी परिवर्तन होता है। इसे सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है।            पहले मनुष्य की सीमित आवश्यकताएं थीं। इनकी पूर्ति के लिए मनुष्य प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग और उपभोग करता था। उसके जीवन में दिखावा बहुत कम था। उसका जीवन एक स्वाभाविक जीवन था। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति आसानी से कर लेता था। जीवन में टेंशन कम था इसलिए मनुष्य स्वस्थ रहता था।            समय का पहिया चलता रहा। सभ्यता का विकास हुआ। अब मनुष्य की आवश्यकताएं पहले से कहीं अधिक हो गयी ं। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अब इंसान को पहले से कहीं अधिक मेहनत करनी पड़ रही थी। जब आदमी परेशानी झेलता है तब उसका दिमाग ज्यादा चलता है और अपनी समस्या का समाधान किसी तरह ढूंढ लेता है।             मनुष्य ने धीरे धीरे प्राकृतिक वस्तुओं के साथ साथ कृत्रिम वस्तुओं का उत्पा...

मैंने कब कहा MAINE KAB KAHAA

हम जब भी किसी के साथ बैठते हैं तो आपस में कुछ न कुछ बात अवश्य करते हैं। इन बातों का सिलसिला यूँ ही नहीं चलता है। कभी अपने बारे में तो कभी दूसरों के बारे में बातचीत होती है। आज हम कहने सुनने की कला को समझने का प्रयास करेंगे।            मनुष्य एक सामजिक प्राणी है। समाज से ही हम अच्छी बुरी हर प्रकार की बातें सीखते हैं। सीखने का यह क्रम जीवन भर चलता रहता है। ऐसा देखने में आया है कि किसी काम के बिगड़ जाने पर उसकी जिम्मेदारी कोई लेना नहीं चाहता है और काम बन जाने पर उसका श्रेय सभी लेना चाहते हैं।             अपनी कही हुई बात को स्वीकार न करना भी झूठ बोलने का एक तरीका है। जब बात कहीं फँस जाती है तो लोग अक्सर यही कहते हैं- मैंने कब कहा और अपनी कही हुई बात से मुकर जाते हैं तथा अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।              झूठ बोलना, आज एक आम बात है। कभी इंसान अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए तो कभी मनोविनोद के लिए झूठ बोलता है। झूठ का नमक डाले बिना बातचीत की सब्जी में स्वाद नहीं आता है। सच बोलने से सुनने वाल...

इंसान की भूख INSAN KI BHOOKH

सृष्टि में जितने भी सजीव प्राणी हैं सभी भोजन करते हैं। भोजन से ही वे पलते- बढ़ते हैं। भोजन सभी की मूलभूत आवश्यकता है। पशु पक्षी जीवजंतु सभी अपना अपना आहार खाते हैं। पेड़ पौधे अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। पशु पक्षी और जीवजंतु अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते हैं उन्हें अपने भोजन के लिए दूसरे जीवजंतुओं और वनस्पतियों पर निर्भर रहना पड़ता है।             पेट भरने के लिए पशु पक्षी और मनुष्य सभी को प्रयास करना पड़ता है। खाली बैठे किसी को भोजन नहीं मिलता है। सुबह होते ही पशु ,पक्षी भोजन की तलाश में निकल पड़ते हैं। मनुष्य भी सुबह होते ही अपने काम में जुट जाता हैऔर किसी तरह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास करता है।              जिसप्रकार पशु, पक्षियों को भोजन की तलाश में काफी दूर तक जाना पड़ जाता है ठीक उसी तरह इंसान को भी अपने जीविकोपार्जन के लिए देश विदेश जाना पड़ता है। पशु पक्षियों की आवश्कताएं कम होती हैं उनका पेट जल्दी भर जाता है किन्तु मनुष्य की आवश्यकताएं अधिक होती हैं उसका पेट कभी भरता ही नहीं है।     ...

सिक्के के दो पहलू SIKKE KE DO PAHLOO

हम जब भी सिक्के की बात करते हैं तो अनायास ही हमारे दिमाग में सिक्के के दोनों पहलुओं का विचार आता है और हम उसके दोनों पहलुओं को भलीभाँति परख लेते हैं कि उसके दोनों पहलू ठीक ठाक हैं क्योंकि सिक्का तभी चलता है जब उसके दोनों पहलू ठीक हों।             आज हम जिस सिक्के की बात करेंगे वो कोई सामान्य सिक्का नहीं है। यह ऐसा सिक्का है जिसको उछालने की आवश्यकता नहीं है बल्कि इसके दोनों पहलू बारी बारी से स्वत: बदलते रहते हैं। आप को लग रहा होगा कि यह क्या कहा? क्या कोई ऐसा भी सिक्का है जो अपने आप पलट जाता हो? जी, हाँ। मैं बात कर रहा हूँ, समय के सिक्के की।            मनुष्य के जीवन में समय सीमित और मूल्यवान है इसलिए समय को सिक्के के रूप में चित्रित करना शायद अनुचित न रहा होगा।जो लोग समय के मूल्य और उसके महत्व को समझते हैं वे कभी भी व्यर्थ में समय को बर्बाद नहीं करते हैं। कहावत है जो समय को बर्बाद करते हैं समय उन्हें बर्बाद कर देता है। अतः समय का सदा सदुपयोग करना चाहिए।              समय के सिक्के के दो रू...

अपनी राह APNI RAH

समय तेजी से बदल रहा है। शिक्षा और ज्ञान -विज्ञान का भी तेजी से विकास हुआ है। नये- नये आविष्कार होने से लोगों के जीवन में बदलाव आया है। पहले लोगों की आवश्यकताएं कम थी ंं। जैसे - जैसे सभ्यता का विकास हुआ है लोगों की आवश्यकताएं भी बढ़ी है ं। लोगों की पसंद में भी बदलाव आया है।           किसी भी प्रचलित सामाजिक व्यवस्था में अच्छाइयाँ होती हैं इसलिए दीर्घ काल तक समाज में चलन में रहती है । ये जो सामाजिक नियम , रीतिरिवाज और परम्परायें होती हैं इनमें समय के साथ आसानी से बदलाव नहीं हो पाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के जीवन में जो आदतें बन जाती हैं उनका बदल पाना मुश्किल होता है उसे वही सबकुछ अच्छा लगता है जो उसने अपने समय में देखा और अनुभव किया है।           कालांतर में पुराने रीति रिवाज और परम्परायें रूढियों का रूप ले लेते हैं जिन्हें समाज अनुपयोगी होने पर भी अपनाये रहता है। ऐसे रीति रिवाजों को फटे पुराने वस्त्रों के समान त्याग देने में ही समाज की भलाई है। सतीप्रथा का अन्त और विधवा पुनर्विवाह समाजसुधार के अच्छे उदाहरण...

विनम्रता और हमारा जीवन VINAMRATA AUR HAMAARA JEEVAN

मनुष्य में विनम्रता का भाव जन्मजात नहीं होता है। बच्चा जब छोटा होता है तो हँसना, रोना, खाना- पीना और सोना इत्यादि उसकी स्वभाविक क्रियाएँ होती है। जैसे- जैसे बच्चा बड़ा होता है वैसे- वैसे अन्य लोगों के सम्पर्क में रहकर अच्छी बुरी हर प्रकार की बातें सीखता है। समाज में रहकर सीखने की क्रिया को समाजीकरण कहा जाता है। समाजीकरण की क्रिया मनुष्य में जीवन भर चलती रहती है।           बालक में मानवीय गुणों यथा- प्रेम, सेवा, सहयोग, विनम्रता आदि का विकास समाज में रहकर ही होता है। अरस्तू ने कहा है "Man is a social animal." इस वाक्य में से यदि social शब्द को हटा दिया जाए तो Man is a animal. शेष रह जाता है। वास्तव में देखा जाए , यदि कोई मनुष्य दूसरों के सुख दुःख में साथ न देकर केवल अपने ही बारे में सोचता है तो उसका यह व्यवहार पशुवत व्यवहार ही कहा जाएगा।            बालक हो अथवा बड़ा उसमें गुण या अवगुण का विकास धीरे धीरे होता है। जो जैसे लोगो ं के साथ रहता है उनमें रहकर ही अच्छी बुरी बातें सीखता है। उसे जो लोग आकर्षित करते हैं उनके साथ रहना प...

ईश्वर दिखता क्यों नहीं ? ISHWAR DIKHTA KYON NAHI

मैं कोई वैज्ञानिक या दार्शनिक नहीं हूँ और न ही कोई ऐसा चर्चित व्यक्ति हूँ कि हर कोई मेरी बात को तबज्जो दे। लोगों की सोच ऐसी होती है कि वे किसी बात का आकलन इससे करते हैं कि अमुक बात किसके द्वारा कही गई है। यदि कोई आम आदमी कोई खास बात भी कहे तो भी उसकी बात को कोई महत्व नहीं दिया जाता है इसके विपरीत किसी खास व्यक्ति के द्वारा कही गई प्रत्येक बात महत्वपूर्ण दिखती है। बहरहाल जो भी है, भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इसलिए कोई भी अपने विचार व्यक्त कर सकता है।          इस लेख में मैंने यह समझने का प्रयास किया है कि कोई भी वस्तु हमें कब दिखाई देती है और कब दिखाई नहीं देती है। इस बात को मैंने विभिन्न प्रकार से जानने का प्रयास किया है, हो सकता है मेरा विचार आपको भी उचित लगे और आपकी भी समझ में आ जाये।             क्या आपने कभी सोचा है कि श्यामपट पर खड़िया से ही क्यों लिखते हैं कोयले से क्यों नहीं लिखते? और व्हाइट बोर्ड पर व्हाइट मार्कर से क्यों नहीं लिखते हैं। बात साफ है कि दिखाई न देग...

पूर्वाग्रह और हमारा जीवन | POORVAGRAH AUR HAMAARA JEEVAN # BLOG

हम सब समाज में रहते हैं। यदि कोई ऐसा कहे कि उसे समाज की आवश्यकता नहीं है तो उसका यह कथन निराधार और हास्यास्पद है। इस संबंध में प्रसिद्ध विद्वान अरस्तू का कथन उल्लेखनीय है उनके अनुसार, "मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। कोई ऐसा व्यक्ति जो समाज से बाहर रह सकता है या जिसे समाज की आवश्यकता नहीं है तो वो या तो देवता है या फिर पशु।"        हम जब एक दूसरे के साथ उठते बैठते हैं तो कुछ न कुछ बातचीत अवश्य करते हैं। अपने मन की बात दूसरों से कहते हैं और उनकी बात भी सुनते हैं। इस प्रकार विचारों का आदान प्रदान होता है। बातचीत जब खुलेमन से होती है तो उस समय बात करने वाला निसंकोच अपने मन की बात कह देता है। ऐसे समय में बात करने वालों के दिल एक हो जाये और किसी की बुराई करने का मौका मिल जाए तो दिल खोलकर उसकी बुराई करते हैं। बुराई करने में जो आनंद आता है वो आनंद किसी की अच्छाई बताने में नहीं आता है। बुराई अच्छाई की अपेक्षा अधिक तेजी से फैलती है। कहावत भी है-नेकी नौ कोस बदी सौ कोस।           जब दो लोग आपस में बात करते हैं तो अपने दुःख सुख की बात करते हैं और कभी -...

जीवन में समझदारी # JEEVAN MEIN SAMAJHDARI # BLOG

जीवन को सुखमय बनाने की हर किसी की लालसा होती है और हर कोई इसके लिए प्रयासरत भी रहता है। जीवन को सुखमय और सरल बनाने के लिए समझदारी की आवश्यकता होती है।जीवन संघर्षों से भरा है या यह कहें संघर्ष ही जीवन है। संघर्ष करना सजीव होने का लक्षण है। जो संघर्ष नहीं कर रहा है वो निर्जीव है। जीवन से जुड़ी समस्याओं से संघर्ष करते समय हमारी समझदारी ही हमारे काम आती है।            समस्या का समाधान ढूँढ लेना समझदारी है। जीवन में अनेक समस्याएं आती हैं किन्तु हर समस्या का समाधान भी है। जीवन में अनेक बार ऐसा देखने में  आया है, हम जिसे समस्या समझ रहे हैं वो समस्या नहीं बल्कि हमारे लिए वरदान होता है। हमारे जीवन में कुछ नया और शुभ हो जाता है जिसकी हमने कल्पना भी नही की थी। हम ईश्वर को  धन्यवाद देते हैं और कहते हैं कि ईश्वर जो  करता है वो हमारे भले के लिए करता है। हम उसकी महिमा को नहीं समझ पाते हैं वो अलग बात है।              सोच समझकर बात करना ठीक होता है। कुछ लोग बिना सोचे समझे कुछ भी ऊलजलूल बक देते हैं जो सुनने वाले को ठीक नहीं ल...

पैसा-- प्रतिष्ठा और प्रेम PAISA-- PRATISHTHA AUR PREM # BLOG

पैसा और प्रतिष्ठा को लेकर कई बार लोग आपस में चर्चा करने लगते हैं। पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव कहें या इसे भौतिकवादी युग कहें, आज के समय में मनुष्य पैसे को अधिक महत्व दे रहा है। सामाजिक मान प्रतिष्ठा भी पैसे पर टिकी हुई है। समाज में जिसके पास अधिक पैसा है समाज में उसका उतना ही अधिक सम्मान है, इस कारण आदमी सामाजिक मूल्यों यथा-सेवा, सहयोग, आपसी भाईचारा को भुलाकर केवल पैसा कमाने में लगा है।            पैसा जीवन का आधार है। हम जब भी अपने जीवन में काम आने वाली कोई भी वस्तु खरीदना चाहते हैं तो उसके लिए हमें पैसा देना पड़ता है। पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है, यहाँ तक कि धन के लालच में आज का आदमी भी बिक जाता है। रिश्वत लेकर कोई भी अनुचित कार्य करने में उसे जरा सी भी झिझक नहीं होती है। चोर, डाकू और आतंकवादी ये सब पैसे के लिए चोरी और हत्यायें करते हैं।           समय के साथ मनुष्य की सोच भी बदल गयी है। आज जिस व्यक्ति के पास जितना अधिक पैसा है वो उतना ही बड़ा आदमी कहा जाता है। कोई यह नहीं सोचता है कि उसने यह पैसा कैसे कमाया है उचित या अनुचित ...

बडा़ आदमी # BARAA AADAMEE # BLOG

 अक्सर आपने लोगों को कहते सुना होगा कि वो तो बहुत बड़ा आदमी है। बड़ा बनने की चाह हर किसी में होती है और इंसान बड़ा बनने की कोशिश भी करता है भले ही वो बड़ा न बन पाए यह अलग बात है।आज के इस लेख में यह जानने का प्रयास करेंगे कि आखिर बड़ा होता कौन है ? लोग किसे बड़ा आदमी कहते हैं?           बड़ा आदमी बनने के लिए व्यक्ति को महत्वाकांक्षी होना जरूरी है। कहावत भी है - जहाँ चाह है वहाँ राह है। कोई भी आदमी किसी काम को करने का दृढ़ निश्चय कर ले तो वह उस काम में एक न एक दिन सफलता प्राप्त कर ही लेता है। व्यक्ति का मनोबल भी बड़ा आदमी बनने में उसका सहयोग करता है। जो लोग काम शुरू करने से पहले ही मन उदास कर लेते हैं और बेमन से काम शुरू करते हैं उन्हें बड़ा आदमी बनने का सपना नही ं देखना चाहिए।             कोई भी आदमी यूँ ही बड़ा नहीं बन जाता है। उसे जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। जो भी जीवन में आई मुसीबतों का सामना करता हुआ आगे बढ़ता रहता है और सदा अडिग होकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है वह  निश्चय ...

मतलब की दुनिया # MATALAB KI DUNIYA # BLOG

'दुनिया मतलब की है।'इस कहावत ने मतलब शब्द को इतना बदनाम कर दिया है कि मतलब के बारे कुछ लिखने से पहले सोचना पड़ रहा है कि कहीं लोग मुझे मतलबी न समझ बैठें। सोचा जाय तो हर इंसान मतलबी होता है। किसी को मतलबी कहने पर न जाने उसे गाली क्यों लगती है। हो सकता है हम सब मतलब का भी गलत मतलब निकाल लिए हों।           वैसे तो हर किसी बात का कोई न कोई मतलब होता है और बिना मतलब की कोई बात नहीं होती है। जब हम किसी संदर्भ से हटकर बात करने लगते हैं तो वो बेमतलब की बात हो जाती है। ऐसी बात को सुनने वाला कोई महत्व नहीं देता है। वही बात ठीक लगती है जो कहने वाले और सुनने वाले दोनों के मतलब की हो। केवल अपने मतलब की बात करने वाले को मतलबी कहा जाता है।         जब हम किसी से बात करते हैं और वो हमारी बात का अर्थ नहीं समझ पाता है तब हम मतलब कहकर दूसरे सरल शब्दों में अपनी बात समझाने का प्रयास करते हैं, ऐसा अक्सर होता है। कुछ लोगों की तो आदत ही ऐसी हो जाती है कि वे अपनी हर बात में मतलब जोड़ देते हैं। जो इंसान बिना मतलब के अपनी बात नहीं कह पा रहा है उसे आप क्या कहें...

एक पुराने पेड़ की आत्मकथा # EK PURANE PED KI ATMKATHA # BLOG

मेरा जन्म किसी पौधशाला में नहीं हुआ। घरवालों का मानना है कि फल का कोई बीज किसी तरह दीवार के सहारे मिट्टी में दबा रहा वही पर एक नन्हें पौधे की मुस्कान दिखाई दी। ऐसा देखकर सभी आश्चर्यचकित और प्रसन्न हुए। किसी ने ठीक ही कहा है 'जाको राखे साईंया मार सके ना कोय'। बात भी सही है यहाँ पर पौधा उगने के लिए कोई  खास जगह नहीं थी। किन्तु ईश्वर की कृपा से सब सम्भव है। ईश्वर असम्भव को भी सम्भव बना देते हैं। कबीर दास जी ने भी इस बात को स्वीकार किया है तभी तो  कहा---साहब से सब होत है बन्दे ते कुछ नाहिं। राई ते पर्वत करे पर्वत राई माहिं।।            समय बीतता गया अब मुझमें अनेक पत्तियाँ निकल आयीं। घरवाले खुशी खुशी बड़े मनोयोग से सदा मेरी देखभाल करते रहते थे किन्तु उन्हें एक चिंता सदा सताती रहती थी कि मेरे बड़ा होने के लिए उचित और पर्याप्त जगह नहीं थी। घरवाले मेरा पालन पोषण एक बच्चे की तरह कर रहे थे। मैं उनके घर में अकेला फल का पौधा था जो उन्हें ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुआ था। उचित देखभाल के परिणामस्वरूप मेरी बढ़वार अच्छी हो रही थी। अब हर हालत में उन्हें मुझे दूसरी...

अनुकूलन और हम # ANUKOOLAN AUR HAM # BLOG

 मैं कोई विद्वान या भाषाविद नहीं हूँ जो मैं आपको अनुकूलन शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में समझाऊँ कि यह शब्द किन किन शब्दों से मिलकर बना है और यह विशेषता किस अर्थ में प्रयोग किया जाता है। मैं तो  केवल इतना जानता हूँ कि जब कोई परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को  बना या ढाल लेता है तो यह कहा जायेगा कि उसने अनुकूलन कर लिया है।              अनुकूलन की प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया होती है इसमें जीव को बहुत संघर्ष करना पड़ता है। इसमें जीवों को प्रतिकूल परिस्थितियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है। इस समयावधि में जो जीव परिस्थितियों के साथ संघर्ष करके अनुकूलन नहीं कर पाते हैं  उनका जीवन बहुत ही कष्टदायी होता है या फिर वे नष्ट ही हो जाते हैं। कुछ जीवों में अनुकूलन काफी लम्बी समयावधि में हो पाता है ऐसे में उनका रंग रूप और आकार भी  बदल जाता है।            वृक्षों को आपने देखा होगा। कुछ वृक्ष सदा हरे भरे रहते हैं जबकि कुछ वृक्ष पतझड़ ले लेते हैं। जो वृक्ष जलवायु के साथ अनुकूलन कर लेते हैं वे सदा हरे भरे बने रहते हैं ...

व्यस्त रहो मस्त रहो #VYAST RAHO # MAST RAHO# BLOG

मानव जीवन में व्यस्तता बहुत जरूरी है। अंग्रेजी में कहावत है - 'Empty miind is devil's workshop. ' खाली दिमाग शैतान का घर होता है । अर्थात खाली बैठे आदमी का शरीर भले ही नहीं चल रहा हो किन्तु उसका दिमाग सदा चलता रहता है। ऐसे आदमी के मन में जैसे विचार आयंगे वैसा ही काम वो करेगा।            आपने अपने घर में बच्चों को तो देखा ही होगा। बच्चे एक जगह शांतिपूर्वक नहीं बैठते हैं। वे सदा इधर उधर कुछ न कुछ उलट-पलट और छेड़छाड़ करते रहते हैं। घर में रखे सामान की तोड़-फोड़ करना और काम विगाड़ना उनके लिए सामान्य बात है। इसका मुख्य कारण यह होता है कि वे कोई काम करने लायक तो हैं नहीं जिसमें वे व्यस्त रहें अत: उनके मन में कुछ न कुछ विचार आते रहते हैं और वे  वैसा ही करते रहते हैं। उनका सही गलत से भी कोई मतलब नहीं होता है।             काम करने वाले आदमी का समय आसानी से व्यतीत हो जाता है। समय कब बीत गया उसे पता ही नहीं चलता है।काम पूरा हो जाने पर उसको सुख की अनुभूति होती है क्योंकि व्यक्ति का कोई भी कार्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसके जी...

मानव जीवन में संतुलन और सुख का सम्बन्ध#MAANAV JEEVAN MEIN SANTULAN AUR SUKH KA SAMBANDH#BLOG

हम सभी अपने जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं। जीवन को सुखी बनाने के लिए हम सभी प्रयासरत रहते हैं। यदि किसी से बात करें तो वो अपने जीवन से जुड़ी अनेक समस्याएं गिना देगा जिनसे वो दुखी है। कोई गरीबी से दुखी है तो  कोई अमीरी से। आप सोचते होंगे अजीब बात है अमीरी में तो आनन्द ही आनन्द है। अमीर लोगों को कोई दुख नहीं होता है। वास्तव में ऐसा नहीं है। उनका दुख दूसरे प्रकार का दुख होता है। उन्हें सदा अपने कारोबार की चिंता सताती रहती है कि कहीं कोई घाटा हो जाय।          आज के इस भौतिकवादी युग ने मनुष्य के जीवन से उसका सुख हर लिया है। आज का आदमी अधिक से अधिक वस्तुओं का उपयोग करके अपने जीवन को सुखी बनाने का प्रयास कर रहा है। अपने पड़ोसी के पास ऐसी वस्तु देखकर जो उसके पास नहीं है  बहुत दुखी होता है जब कि उसको कोई दुख नही ंं है।          सुख-दुख का सम्बन्ध मनुष्य के विचार और उसकी मानसिकता से है। सकरात्मक सोच वाला व्यक्ति सुखी रहता है । नकरात्मक सोच वाले व्यक्ति को हर चीज में कमी दिखाई देती है और वो दुखी रहता है। कुछ लोगों की ऐसी सोच होती कि ...

सुन्दर कैसे बनें # SUNDAR KAISE BANE # BLOG

सुन्दरता व्यक्ति के चरित्र का एक आवश्यक गुण होता है। सुन्दर व्यक्ति हर किसी का मन मोह लेता है। सुन्दरता से कौन प्रेम नहीं करता है इसीलिए हर कोई सुन्दर बनना चाहता है। अब प्रश्न उठता है कि सुन्दर कैसे बना जाय, इसी विषय के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करने का मेरा विचार है। सुन्दरता दो प्रकार की होती है- पहली वाह्य सुन्दरता और दूसरी आन्तरिक सुन्दरता। वाह्य सुन्दरता से मेरा अभिप्राय शारीरिक सुन्दरता से तथा आन्तरिक सुन्दरता से मेरा तात्पर्य आचरण की सुन्दरता से है। अब इन दोनों प्रकार की सुन्दरताओं को समझने और उनको प्राप्त करके सुन्दर बनने का प्रयास करते हैं।          पहले हम शारीरिक सुन्दरता की बात करते हैं। वैसे तो शारीरिक सुन्दरता जन्मजात होती है, सुन्दर माता-पिता के बच्चे भी सुन्दर ही होते हैं। शारीरिक सुन्दरता प्राप्त करने के लिए हमें बहुत अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता है क्योंकि बच्चे का  रंग-रूप अधिक -तर अपने माता- पिता जैसा ही होता है। शरीर के रंग में तो हम बहुत अधिक परिवर्तन नहीं ला सकते हैं, हाँ इतना अवश्य है कि स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें तो शरीर के...

आप भला तो जग भला # AAP BHALAA TO JAG BHALAA # BLOG

समाज में अनेक प्रकार के लोग होते हैं। उन सबको समझ पाना और उनके बारे में कुछ कह पाना बड़ा ही मुश्किल कार्य है। उसका कारण यह है कि किसी एक ही विषय पर लोग एक मत नहीं हो पाते हैं, सबकी सोच और सबके विचार अलग -अलग होते हैं। फिर समाज में इतने अधिक लोग और उनके अनेक प्रकार के विचारों को समझना नामुमकिन है।            विषय को समझने की दृष्टि से समाज के सभी लोगों को तीन श्रेणियों में विभाजित कर लिया है । पहली श्रेणी में वे लोग आते हैं जो अपने जीवन में सदा दूसरों की भलाई के लिए कार्य करते हैं। ये लोग तन, मन और धन से सदैव दूसरों का हित करते हैं। ये संत स्वभाव के लोग होते हैं। ऐसा कहा गया है--परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर। इनकी संख्या समाज में कम होती है।            दूसरी श्रेणी में ऐसे लोग आते हैं जो अपने जीवन में अपना हित करने के साथ -साथ दूसरों का हित भी चाहते हैं। इनका विचार होता है कि हमारा अहित न हो, यदि किसी का भला हो जा रहा है तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। इस प्रकार की सोच वाले लोग सज्जन कहलाते हैं। समाज में इस प्रकार के लोग काफी संख्...