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सत्य की खोज SATYA KI KHOJ

आज मैं जिस बिषय पर लिखने जा रहा हूँ उसका कोई आदि और अन्त नहीं है.जब किसी वस्तु का कोई सिर पैर ही नहीं हो तो अपनी बात कहाँ से शुरू की जाये कुछ समझ नहीं आ रहा है फिर भी अपनी बात तो कहनी ही है.          जब हम कोई नयी खोज करते हैं तो उसके लिए हमें अनेक बार प्रयास करना पड़ता है क्योंकि कि कोई भी सफलता हमें आसानी से प्राप्त नहीं होती है। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं होता है कि हम प्रयास करना बंद कर दें और हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाये ं।          हम अपने काम में यदि असफल भी जाते हैं तो भी हमें यह सीख अवश्य मिलती है कि हमसे कहीं चूक हुई है और हम दूसरी तरह अपना प्रयास करते हैं। हमें अपने प्रयास से कुछ न कुछ सीखने को अवश्य मिलता है। हमारा प्रत्येक प्रयास हमें सफलता के निकट ले जाता है, इसीलिए असफलता को सफलता तक पहुँचने की सीढ़ी कहा जाता है। मानव जीवन के इतिहास में जितनी भी खोजें हुई हैं वे सब लम्बे संघर्ष और प्यास का परिणाम हैं।          विज्ञान इस बात को मानता है कि कोई भी वस्तु न तो नये सिरे से उत्पन्न की जा सकती है और न ...

नानी का घर NAANee KA GHAR

 मेरी नानी का घर गाँव में है। गाँव का नाम सुनते ही एक बार फिर आपके मन में गाँव का पुराना दृश्य जरूर आया होगा। गाँव में सुविधाओं का अभाव, गंदगी के ढेर और कच्चे मकान होना ये सब आम बात थीं। शहर के लोग तो गाँव का नाम सुनते ही डर जाते थे। गाँव में जाना और वहाँ से रिश्ता करना उन्हें कदापि मंजूर नहीं था। इतना सबकुछ होते हुए भी शहर के लोग गाँव की कुछ बातों की प्रशंसा भी करते थे जैसे-  बिना मिलावट का दूध-घी ,ताजा फल और सब्जियां, गन्ने का ताजा रस और गरम -गरम ताजा गुण इत्यादि।            गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि होता है। मेरे  नाना जी भी खेती करते हैं।। वो अपने खतों में मुख्य रूप से धान, गेहूँ ,मक्का, चना , मूंगफली और गन्ना की फसलें करते हैं। मैं जब भी नानी के घर जाता तो अपने मामाजी के साथ खेतों पर घूमने अवश्य जाता था। खेतों में लहलहाती फसलों को देखकर मेरे आनंद का कोई ठिकाना नहीं रहता था। चना और मूंगफली के गरम- गरम होले मुझे बहुत अच्छे लगते थे। नानाजी गन्ने से गुड़ भी बनाते थे। मैं जब भी जाड़े की छुट्टियों में नानाजी के यहाँ जाता तो गरम गरम ग...