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कौन आगे और कौन पीछे KAUN AAGE AUR KAUN PEECHHE

आपने खिलाड़ियों को दौड़ते हुए देखा होगा। इस दौड़ में जीत उसी की होती है जो दौड़ में आगे निकल जाता है। दौड़ जब लम्बी होती है तो धावक को ट्रैक (जिसमें खिलाड़ी दौड़ता है) के कई चक्कर लगाने पडते हैं। इस दौड़ में कौन आगे निकल जायेगा कुछ कहा नहीं जा सकता है। कभी कोई आगे और कभी कोई आगे यह सब चलता रहता है। अन्त में जो सबसे आगे निकल जाता है जीत उसी की होती है।              मनुष्य का जीवन भी एक लम्बी दौड़ की तरह है। जीवन की इस दौड़ में हर कोई आगे निकलने का प्रयास कर रहा है। दर्शक-समाज को कभी कोई आगे निकलता दिखाई देता है और कभी कोई। इस दौड़ में, हमें जिससे आत्मीयता होती है उसे आगे निकलता देखकर हम खुश होते हैं और दूसरा कोई आगे निकलता है तो हम उदास हो जाते हैं। यह मानव स्वभाव है।                 ईश्वर ने हमें बहुत कुछ दिया है लेकिन सबकुछ नहीं दिया है। किसी को ज्ञान दिया है तो उसे धन नहीं दिया। किसी को स्वर दिया है तो उसे सुन्दरता नहीं दी। ईश्वर ने जो कुछ भी किया है हमारे भले के लिए किया है। उसने ना हमें कोई सजा दी है और ...

गैर बने अपने GAIR BANE APNE

समय के साथ साथ हमारे जीवन में बदलाव होता रहता है। परिस्थितियां बदलती हैं तो हमारी विचाधारा भी बदल जाती है। जो व्यक्ति हमें बुरा लगता था  परिस्थितियों वश वही व्यक्ति हमें अच्छा लगने लगता है। जिंदगी भी अजीब है इसमें कब कौन सा मोड़ आ जाये निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस संघर्षपूर्ण जीवन में मनुष्य जीवन पथ के मोड़ों से गुजरते हुए आगे बढ़ता रहता है। यही जिंदगी है।              एक आम आदमी के मन में अपने-पराये, मित्र-शत्रु की सोच होती ही है लेकिन जिस इंसान का आत्मिक विकास हो गया हो या यूँ कहें जिसमें समता का भाव आ गया हो उसके लिए तो सभी अपने होते हैं कोई पराया नहीं होता है। ऐसा इंसान अपने जीवन में सदा सुखी रहता है । लेकिन ऐसे इंसान समाज में बहुत कम होते हैं।              इस लेख में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि किन कारणों से गैर भी अपने बन जाते हैं और उनका हमारे प्रति पहले से अच्छा बर्ताव हो जाता है।             आज के इस भौतिकवादी युग में हर भलाई बुराई की जड़ पैसा है। जहाँ आदमी...

मानव जीवन में दिखावे का महत्व MAANAV JEEVAN MEIN DIKHAVE KA MAHATAV

परिवर्तन प्रकृति का आवश्यक नियम है। कभी जाड़ा, कभी गर्मी तो कभी बरसात होती है। पेड़ पौधों में भी परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। पेड़ पौधे समय से फूलते फलते हैं। इसी तरह समाज में भी परिवर्तन होता है। इसे सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है।            पहले मनुष्य की सीमित आवश्यकताएं थीं। इनकी पूर्ति के लिए मनुष्य प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग और उपभोग करता था। उसके जीवन में दिखावा बहुत कम था। उसका जीवन एक स्वाभाविक जीवन था। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति आसानी से कर लेता था। जीवन में टेंशन कम था इसलिए मनुष्य स्वस्थ रहता था।            समय का पहिया चलता रहा। सभ्यता का विकास हुआ। अब मनुष्य की आवश्यकताएं पहले से कहीं अधिक हो गयी ं। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अब इंसान को पहले से कहीं अधिक मेहनत करनी पड़ रही थी। जब आदमी परेशानी झेलता है तब उसका दिमाग ज्यादा चलता है और अपनी समस्या का समाधान किसी तरह ढूंढ लेता है।             मनुष्य ने धीरे धीरे प्राकृतिक वस्तुओं के साथ साथ कृत्रिम वस्तुओं का उत्पा...

मैंने कब कहा MAINE KAB KAHAA

हम जब भी किसी के साथ बैठते हैं तो आपस में कुछ न कुछ बात अवश्य करते हैं। इन बातों का सिलसिला यूँ ही नहीं चलता है। कभी अपने बारे में तो कभी दूसरों के बारे में बातचीत होती है। आज हम कहने सुनने की कला को समझने का प्रयास करेंगे।            मनुष्य एक सामजिक प्राणी है। समाज से ही हम अच्छी बुरी हर प्रकार की बातें सीखते हैं। सीखने का यह क्रम जीवन भर चलता रहता है। ऐसा देखने में आया है कि किसी काम के बिगड़ जाने पर उसकी जिम्मेदारी कोई लेना नहीं चाहता है और काम बन जाने पर उसका श्रेय सभी लेना चाहते हैं।             अपनी कही हुई बात को स्वीकार न करना भी झूठ बोलने का एक तरीका है। जब बात कहीं फँस जाती है तो लोग अक्सर यही कहते हैं- मैंने कब कहा और अपनी कही हुई बात से मुकर जाते हैं तथा अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।              झूठ बोलना, आज एक आम बात है। कभी इंसान अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए तो कभी मनोविनोद के लिए झूठ बोलता है। झूठ का नमक डाले बिना बातचीत की सब्जी में स्वाद नहीं आता है। सच बोलने से सुनने वाल...

इंसान की भूख INSAN KI BHOOKH

सृष्टि में जितने भी सजीव प्राणी हैं सभी भोजन करते हैं। भोजन से ही वे पलते- बढ़ते हैं। भोजन सभी की मूलभूत आवश्यकता है। पशु पक्षी जीवजंतु सभी अपना अपना आहार खाते हैं। पेड़ पौधे अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। पशु पक्षी और जीवजंतु अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते हैं उन्हें अपने भोजन के लिए दूसरे जीवजंतुओं और वनस्पतियों पर निर्भर रहना पड़ता है।             पेट भरने के लिए पशु पक्षी और मनुष्य सभी को प्रयास करना पड़ता है। खाली बैठे किसी को भोजन नहीं मिलता है। सुबह होते ही पशु ,पक्षी भोजन की तलाश में निकल पड़ते हैं। मनुष्य भी सुबह होते ही अपने काम में जुट जाता हैऔर किसी तरह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास करता है।              जिसप्रकार पशु, पक्षियों को भोजन की तलाश में काफी दूर तक जाना पड़ जाता है ठीक उसी तरह इंसान को भी अपने जीविकोपार्जन के लिए देश विदेश जाना पड़ता है। पशु पक्षियों की आवश्कताएं कम होती हैं उनका पेट जल्दी भर जाता है किन्तु मनुष्य की आवश्यकताएं अधिक होती हैं उसका पेट कभी भरता ही नहीं है।     ...

सिक्के के दो पहलू SIKKE KE DO PAHLOO

हम जब भी सिक्के की बात करते हैं तो अनायास ही हमारे दिमाग में सिक्के के दोनों पहलुओं का विचार आता है और हम उसके दोनों पहलुओं को भलीभाँति परख लेते हैं कि उसके दोनों पहलू ठीक ठाक हैं क्योंकि सिक्का तभी चलता है जब उसके दोनों पहलू ठीक हों।             आज हम जिस सिक्के की बात करेंगे वो कोई सामान्य सिक्का नहीं है। यह ऐसा सिक्का है जिसको उछालने की आवश्यकता नहीं है बल्कि इसके दोनों पहलू बारी बारी से स्वत: बदलते रहते हैं। आप को लग रहा होगा कि यह क्या कहा? क्या कोई ऐसा भी सिक्का है जो अपने आप पलट जाता हो? जी, हाँ। मैं बात कर रहा हूँ, समय के सिक्के की।            मनुष्य के जीवन में समय सीमित और मूल्यवान है इसलिए समय को सिक्के के रूप में चित्रित करना शायद अनुचित न रहा होगा।जो लोग समय के मूल्य और उसके महत्व को समझते हैं वे कभी भी व्यर्थ में समय को बर्बाद नहीं करते हैं। कहावत है जो समय को बर्बाद करते हैं समय उन्हें बर्बाद कर देता है। अतः समय का सदा सदुपयोग करना चाहिए।              समय के सिक्के के दो रू...

अपनी राह APNI RAH

समय तेजी से बदल रहा है। शिक्षा और ज्ञान -विज्ञान का भी तेजी से विकास हुआ है। नये- नये आविष्कार होने से लोगों के जीवन में बदलाव आया है। पहले लोगों की आवश्यकताएं कम थी ंं। जैसे - जैसे सभ्यता का विकास हुआ है लोगों की आवश्यकताएं भी बढ़ी है ं। लोगों की पसंद में भी बदलाव आया है।           किसी भी प्रचलित सामाजिक व्यवस्था में अच्छाइयाँ होती हैं इसलिए दीर्घ काल तक समाज में चलन में रहती है । ये जो सामाजिक नियम , रीतिरिवाज और परम्परायें होती हैं इनमें समय के साथ आसानी से बदलाव नहीं हो पाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के जीवन में जो आदतें बन जाती हैं उनका बदल पाना मुश्किल होता है उसे वही सबकुछ अच्छा लगता है जो उसने अपने समय में देखा और अनुभव किया है।           कालांतर में पुराने रीति रिवाज और परम्परायें रूढियों का रूप ले लेते हैं जिन्हें समाज अनुपयोगी होने पर भी अपनाये रहता है। ऐसे रीति रिवाजों को फटे पुराने वस्त्रों के समान त्याग देने में ही समाज की भलाई है। सतीप्रथा का अन्त और विधवा पुनर्विवाह समाजसुधार के अच्छे उदाहरण...