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वाणी

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Photo by  freestocks.org  from  Pexels वाणी को तू जान रे, बिल्कुल तीर समान । छूटा शर क्या आ सके, वापस पुनः कमान ।। कटुक वचन मत बोलिए, चुभता तीर समान । बात का घाव भरता नहीं,जानत सकल जहान ।। सज्जन को है चाहिए, करे न कभी बकवास । इससे शक्ति का सदा, होता बहुत ह्रास ।। ईश्वर ने सबको दिये, एक जीभ दो कान । इसका तो मतलब यही, बोलें कम अधिक दें ध्यान ।। सत्य बोलने में कभी, करना नहिं तू देर । झूठ कभी मत बोलिए, इसमें तो है फेर ।। सत्य वचन में देखिये, कितना है प्रताप । इसे बोलने में कभी, होता नहिं संताप ।। झूठ भी बोला जा सके, यदि इसका हो अभ्यास । किन्तु झूठ का तो सदा, हो जाय परदा फास ।। तेरी अति प्रशंसा करे, उससे सजग हो जाय । कहिं ऐसा करके तुझे, रहा तो नहीं गिराय ।। चुप रहने में फायदा, तेरे कर्कश बोल । मिल भी कुछ नहिं पायेगा,खुल जायगी पोल ।। कोयल से हम सीख लें मीठे बोलें बैन । दूसरोंको तो खुश करें, खुद भी पावें चैन ।।

धन दौलत

दौलत का तू मत कभी,  करना रे अभिमान । छाया माया नहिँ रुके,  ऐसा कहें विद्वान ।। पैसे से ही मिलत हैं, जगत के सब सम्मान । फिर क्यों न हम सब करें, बचत लगाकर ध्यान ।। बचत सदा ही कीजिए,  इसकी समझो आस । काम समय पर आयगी,  पैसों की होगी प्यास ।। घर में है जब धन बढ़े, तब खर्च बढ़ जाय । लेकिन धन के घटन पै,  खर्च न घटने पाय ।। मानव को यदि चाहिए, हर क्षेत्र का दाम । इसके लिए वह करता रहे, कुछ न कुछ फिर काम ।। धन को या तो खर्च करो, अथवा कर दो दान । नही तो इसका नाश हो, ऐसा कहें विद्वान ।।

विद्या

विद्या धन अद्भुत महा, जाके होवै पास । खरचे से तो यह बढै, संचे होवै नास ।। विद्या तो अभ्यास की, ऐसा है विश्वास । मेहनत से जी न चुरा, जो होना चाहे पास ।। ऐसा मत तू जान रे, तुझे न विद्या आय । बार बार रटता रहे, इसका फल तू पाय ।। कैसे हो सकता भला, शिक्षा बिना विकास । अनपढ तो रहता बना, सदा सभी का दास ।। किसी क्षेत्र में ही सदा, करता जो अभ्यास । मिलती उसको निपुणता, ज्ञान का होय विकास ।। विद्या धन सबसे बडा, इससे कोइ न महान । इसको लेकर साथ में, घूमो चाहे जहान ।। विद्यार्थी को है कभी , सुख तो मिलता नाहिं। जो वह सुख पावै करै, फिर विद्या नहिं पाहिं ।। विद्यावान के तौ सदा, होते हैं बड़े ठाट । चोर इसे न चुरा सके, भाई सके न बाँट ।। असफल होने पर कभी, होना नहीं निरास । असफल तो होता सदा, सफल ही के पास ।। जो चाहो विद्या धन से, होना तुम धनवान । मेहनत से करो पढाई, गुरु को दो सम्मान ।।

क्रोध

क्रोध कभी मत कीजिए , बुद्धि का करे नास । बिन बुद्धि क्या कर सका , जग में कोई विकास ।। क्रोध करना ठीक नहीं, यह न किसी को भाय । क्रोधी जन भी तो सदा , बाद में है पछताय ।।  जो कोई चाहे जगत में, सबका प्रिय हो जाय । क्रोध त्यागने पर ही , वह ऐसा कर पाय ।। शांति के बिना तो कभी , क्रोध न जीता जाय । ज्यों पानी डाले बिना , आग न बुझने पाय ।। रक्त चाप के रोग में ,क्रोध है बड़ा सहाय । ज्यों घी डाले आग का , जलना तेज हो जाय ।। आग भी नहिं जला सके , जैसा क्रोध जलाय । क्रोधी जन का तो सदा , तन दुबला हो जाय ।। क्रोध को सेवक रूप में, जो कोई ला पाय । उसके जीवन में यही , अनेक काम बनाय ।।