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विनम्रता और हमारा जीवन VINAMRATA AUR HAMAARA JEEVAN

मनुष्य में विनम्रता का भाव जन्मजात नहीं होता है। बच्चा जब छोटा होता है तो हँसना, रोना, खाना- पीना और सोना इत्यादि उसकी स्वभाविक क्रियाएँ होती है। जैसे- जैसे बच्चा बड़ा होता है वैसे- वैसे अन्य लोगों के सम्पर्क में रहकर अच्छी बुरी हर प्रकार की बातें सीखता है। समाज में रहकर सीखने की क्रिया को समाजीकरण कहा जाता है। समाजीकरण की क्रिया मनुष्य में जीवन भर चलती रहती है।           बालक में मानवीय गुणों यथा- प्रेम, सेवा, सहयोग, विनम्रता आदि का विकास समाज में रहकर ही होता है। अरस्तू ने कहा है "Man is a social animal." इस वाक्य में से यदि social शब्द को हटा दिया जाए तो Man is a animal. शेष रह जाता है। वास्तव में देखा जाए , यदि कोई मनुष्य दूसरों के सुख दुःख में साथ न देकर केवल अपने ही बारे में सोचता है तो उसका यह व्यवहार पशुवत व्यवहार ही कहा जाएगा।            बालक हो अथवा बड़ा उसमें गुण या अवगुण का विकास धीरे धीरे होता है। जो जैसे लोगो ं के साथ रहता है उनमें रहकर ही अच्छी बुरी बातें सीखता है। उसे जो लोग आकर्षित करते हैं उनके साथ रहना प...

ईश्वर दिखता क्यों नहीं ? ISHWAR DIKHTA KYON NAHI

मैं कोई वैज्ञानिक या दार्शनिक नहीं हूँ और न ही कोई ऐसा चर्चित व्यक्ति हूँ कि हर कोई मेरी बात को तबज्जो दे। लोगों की सोच ऐसी होती है कि वे किसी बात का आकलन इससे करते हैं कि अमुक बात किसके द्वारा कही गई है। यदि कोई आम आदमी कोई खास बात भी कहे तो भी उसकी बात को कोई महत्व नहीं दिया जाता है इसके विपरीत किसी खास व्यक्ति के द्वारा कही गई प्रत्येक बात महत्वपूर्ण दिखती है। बहरहाल जो भी है, भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इसलिए कोई भी अपने विचार व्यक्त कर सकता है।          इस लेख में मैंने यह समझने का प्रयास किया है कि कोई भी वस्तु हमें कब दिखाई देती है और कब दिखाई नहीं देती है। इस बात को मैंने विभिन्न प्रकार से जानने का प्रयास किया है, हो सकता है मेरा विचार आपको भी उचित लगे और आपकी भी समझ में आ जाये।             क्या आपने कभी सोचा है कि श्यामपट पर खड़िया से ही क्यों लिखते हैं कोयले से क्यों नहीं लिखते? और व्हाइट बोर्ड पर व्हाइट मार्कर से क्यों नहीं लिखते हैं। बात साफ है कि दिखाई न देग...