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अनुकूलन और हम ANUKOOLAN AUR HAM

 मैं कोई विद्वान या भाषाविद नहीं हूँ जो मैं आपको अनुकूलन शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में समझाऊँ कि यह शब्द किन किन शब्दों से मिलकर बना है और यह विशेषता किस अर्थ में प्रयोग किया जाता है। मैं तो  केवल इतना जानता हूँ कि जब कोई परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को  बना या ढाल लेता है तो यह कहा जायेगा कि उसने अनुकूलन कर लिया है।              अनुकूलन की प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया होती है इसमें जीव को बहुत संघर्ष करना पड़ता है। इसमें जीवों को प्रतिकूल परिस्थितियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है। इस समयावधि में जो जीव परिस्थितियों के साथ संघर्ष करके अनुकूलन नहीं कर पाते हैं  उनका जीवन बहुत ही कष्टदायी होता है या फिर वे नष्ट ही हो जाते हैं। कुछ जीवों में अनुकूलन काफी लम्बी समयावधि में हो पाता है ऐसे में उनका रंग रूप और आकार भी  बदल जाता है।            वृक्षों को आपने देखा होगा। कुछ वृक्ष सदा हरे भरे रहते हैं जबकि कुछ वृक्ष पतझड़ ले लेते हैं। जो वृक्ष जलवायु के साथ अनुकूलन कर लेते हैं वे सदा हरे भरे बने रहते हैं ...

व्यस्त रहो मस्त रहो #VYAST RAHO # MAST RAHO# BLOG

मानव जीवन में व्यस्तता बहुत जरूरी है। अंग्रेजी में कहावत है - 'Empty miind is devil's workshop. ' खाली दिमाग शैतान का घर होता है । अर्थात खाली बैठे आदमी का शरीर भले ही नहीं चल रहा हो किन्तु उसका दिमाग सदा चलता रहता है। ऐसे आदमी के मन में जैसे विचार आयंगे वैसा ही काम वो करेगा।            आपने अपने घर में बच्चों को तो देखा ही होगा। बच्चे एक जगह शांतिपूर्वक नहीं बैठते हैं। वे सदा इधर उधर कुछ न कुछ उलट-पलट और छेड़छाड़ करते रहते हैं। घर में रखे सामान की तोड़-फोड़ करना और काम विगाड़ना उनके लिए सामान्य बात है। इसका मुख्य कारण यह होता है कि वे कोई काम करने लायक तो हैं नहीं जिसमें वे व्यस्त रहें अत: उनके मन में कुछ न कुछ विचार आते रहते हैं और वे  वैसा ही करते रहते हैं। उनका सही गलत से भी कोई मतलब नहीं होता है।             काम करने वाले आदमी का समय आसानी से व्यतीत हो जाता है। समय कब बीत गया उसे पता ही नहीं चलता है।काम पूरा हो जाने पर उसको सुख की अनुभूति होती है क्योंकि व्यक्ति का कोई भी कार्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसके जी...

मानव जीवन में संतुलन और सुख का सम्बन्ध MAANAV JEEVAN MEIN SANTULAN AUR SUKH KA SAMBANDH

हम सभी अपने जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं। जीवन को सुखी बनाने के लिए हम सभी प्रयासरत रहते हैं। यदि किसी से बात करें तो वो अपने जीवन से जुड़ी अनेक समस्याएं गिना देगा जिनसे वो दुखी है। कोई गरीबी से दुखी है तो  कोई अमीरी से। आप सोचते होंगे अजीब बात है अमीरी में तो आनन्द ही आनन्द है। अमीर लोगों को कोई दुख नहीं होता है। वास्तव में ऐसा नहीं है। उनका दुख दूसरे प्रकार का दुख होता है। उन्हें सदा अपने कारोबार की चिंता सताती रहती है कि कहीं कोई घाटा हो जाय।          आज के इस भौतिकवादी युग ने मनुष्य के जीवन से उसका सुख हर लिया है। आज का आदमी अधिक से अधिक वस्तुओं का उपयोग करके अपने जीवन को सुखी बनाने का प्रयास कर रहा है। अपने पड़ोसी के पास ऐसी वस्तु देखकर जो उसके पास नहीं है  बहुत दुखी होता है जब कि उसको कोई दुख नही ंं है।          सुख-दुख का सम्बन्ध मनुष्य के विचार और उसकी मानसिकता से है। सकरात्मक सोच वाला व्यक्ति सुखी रहता है । नकरात्मक सोच वाले व्यक्ति को हर चीज में कमी दिखाई देती है और वो दुखी रहता है। कुछ लोगों की ऐसी सोच होती कि ...

सुन्दर कैसे बनें SUNDAR KAISE BANE

सुन्दरता व्यक्ति के चरित्र का एक आवश्यक गुण होता है। सुन्दर व्यक्ति हर किसी का मन मोह लेता है। सुन्दरता से कौन प्रेम नहीं करता है इसीलिए हर कोई सुन्दर बनना चाहता है। अब प्रश्न उठता है कि सुन्दर कैसे बना जाय, इसी विषय के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करने का मेरा विचार है। सुन्दरता दो प्रकार की होती है- पहली वाह्य सुन्दरता और दूसरी आन्तरिक सुन्दरता। वाह्य सुन्दरता से मेरा अभिप्राय शारीरिक सुन्दरता से तथा आन्तरिक सुन्दरता से मेरा तात्पर्य आचरण की सुन्दरता से है। अब इन दोनों प्रकार की सुन्दरताओं को समझने और उनको प्राप्त करके सुन्दर बनने का प्रयास करते हैं।          पहले हम शारीरिक सुन्दरता की बात करते हैं। वैसे तो शारीरिक सुन्दरता जन्मजात होती है, सुन्दर माता-पिता के बच्चे भी सुन्दर ही होते हैं। शारीरिक सुन्दरता प्राप्त करने के लिए हमें बहुत अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता है क्योंकि बच्चे का  रंग-रूप अधिक -तर अपने माता- पिता जैसा ही होता है। शरीर के रंग में तो हम बहुत अधिक परिवर्तन नहीं ला सकते हैं, हाँ इतना अवश्य है कि स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें तो शरीर के...

आप भला तो जग भला AAP BHALAA TO JAG BHALAA

समाज में अनेक प्रकार के लोग होते हैं। उन सबको समझ पाना और उनके बारे में कुछ कह पाना बड़ा ही मुश्किल कार्य है। उसका कारण यह है कि किसी एक ही विषय पर लोग एक मत नहीं हो पाते हैं, सबकी सोच और सबके विचार अलग -अलग होते हैं। फिर समाज में इतने अधिक लोग और उनके अनेक प्रकार के विचारों को समझना नामुमकिन है।            विषय को समझने की दृष्टि से समाज के सभी लोगों को तीन श्रेणियों में विभाजित कर लिया है । पहली श्रेणी में वे लोग आते हैं जो अपने जीवन में सदा दूसरों की भलाई के लिए कार्य करते हैं। ये लोग तन, मन और धन से सदैव दूसरों का हित करते हैं। ये संत स्वभाव के लोग होते हैं। ऐसा कहा गया है--परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर। इनकी संख्या समाज में कम होती है।            दूसरी श्रेणी में ऐसे लोग आते हैं जो अपने जीवन में अपना हित करने के साथ -साथ दूसरों का हित भी चाहते हैं। इनका विचार होता है कि हमारा अहित न हो, यदि किसी का भला हो जा रहा है तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। इस प्रकार की सोच वाले लोग सज्जन कहलाते हैं। समाज में इस प्रकार के लोग काफी संख्...

सफलता प्राप्ति में धैर्य और समय का महत्व SAFALTAA PRAAPTI MEIN DHAIRYA AUR SAMAY KA MAHATV

जब हम किसी लक्ष्य में सफलता प्राप्त करने की बात करते हैं तो हर कोई सबसे पहले मेहनत को वरीयता देता है। बात भी सही है, बिना मेहनत किये कोई भी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है। यदि कोई व्यक्ति अपने काम में असफल हो जाता है तो एक सामान्य व्यक्ति भी बिना सोचे समझे सीधी सादी सबके द्वारा कही गई बात को कह देता है  'मेहनत नही ं की तो सफलता कैसे मिलती '।              'परिश्रम सफलता की कुंजी है'। यह कथन सर्वथा सत्य है, इसे नकारा नहीं जा सकता है। मैंने अपने जीवन में अनेक लोग ऐसे भी देखे हैं, जहाँ तक मेरी जानकारी है उन्होंने अपने काम में भरपूर मेहनत की। मेहनत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। बेचारे इसी आशा में रहते कि सफलता का स्वाद उन्हें भी चखने को मिल जाए किन्तु उनके मुंह में सफलता का स्वाद चखने के लिए आयी लार ज्यों की त्यो ं रह जाती।               लोग कहते हैं -'धैर्य का फल मीठा होता है'। अक्सर लोग मतलब की बात समझ लेते हैं किंतु बात का मतलब या तो समझने की कोशिश नहीं करते या उनकी समझ में नहीं आता है। संघर्ष क...

सत्य की खोज SATYA KI KHOJ

आज मैं जिस बिषय पर लिखने जा रहा हूँ उसका कोई आदि और अन्त नहीं है.जब किसी वस्तु का कोई सिर पैर ही नहीं हो तो अपनी बात कहाँ से शुरू की जाये कुछ समझ नहीं आ रहा है फिर भी अपनी बात तो कहनी ही है.          जब हम कोई नयी खोज करते हैं तो उसके लिए हमें अनेक बार प्रयास करना पड़ता है क्योंकि कि कोई भी सफलता हमें आसानी से प्राप्त नहीं होती है। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं होता है कि हम प्रयास करना बंद कर दें और हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाये ं।          हम अपने काम में यदि असफल भी जाते हैं तो भी हमें यह सीख अवश्य मिलती है कि हमसे कहीं चूक हुई है और हम दूसरी तरह अपना प्रयास करते हैं। हमें अपने प्रयास से कुछ न कुछ सीखने को अवश्य मिलता है। हमारा प्रत्येक प्रयास हमें सफलता के निकट ले जाता है, इसीलिए असफलता को सफलता तक पहुँचने की सीढ़ी कहा जाता है। मानव जीवन के इतिहास में जितनी भी खोजें हुई हैं वे सब लम्बे संघर्ष और प्यास का परिणाम हैं।          विज्ञान इस बात को मानता है कि कोई भी वस्तु न तो नये सिरे से उत्पन्न की जा सकती है और न ...

नानी का घर NAANee KA GHAR

 मेरी नानी का घर गाँव में है। गाँव का नाम सुनते ही एक बार फिर आपके मन में गाँव का पुराना दृश्य जरूर आया होगा। गाँव में सुविधाओं का अभाव, गंदगी के ढेर और कच्चे मकान होना ये सब आम बात थीं। शहर के लोग तो गाँव का नाम सुनते ही डर जाते थे। गाँव में जाना और वहाँ से रिश्ता करना उन्हें कदापि मंजूर नहीं था। इतना सबकुछ होते हुए भी शहर के लोग गाँव की कुछ बातों की प्रशंसा भी करते थे जैसे-  बिना मिलावट का दूध-घी ,ताजा फल और सब्जियां, गन्ने का ताजा रस और गरम -गरम ताजा गुण इत्यादि।            गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि होता है। मेरे  नाना जी भी खेती करते हैं।। वो अपने खतों में मुख्य रूप से धान, गेहूँ ,मक्का, चना , मूंगफली और गन्ना की फसलें करते हैं। मैं जब भी नानी के घर जाता तो अपने मामाजी के साथ खेतों पर घूमने अवश्य जाता था। खेतों में लहलहाती फसलों को देखकर मेरे आनंद का कोई ठिकाना नहीं रहता था। चना और मूंगफली के गरम- गरम होले मुझे बहुत अच्छे लगते थे। नानाजी गन्ने से गुड़ भी बनाते थे। मैं जब भी जाड़े की छुट्टियों में नानाजी के यहाँ जाता तो गरम गरम ग...

आकर्षण और प्रेम Aakarshan Aur Prem

पोथी पढ़ पढ़ जुग मुआ, पंडित भया न कोय | ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ||                                          कबीरदास जी  कबीर जी जैसे संत और महापुरुष ने प्रेम को इतना महान माना है तो मैं प्रेम को कितना महत्व देता हूँ यह अवर्णनीय है.  इसलिए इस संबंध जो भी कहा जाए वो कम ही होगा क्यूँकि प्रेम को समझना आसान नहीं है.      प्रकृति के सभी जड़ चेतन पदार्थ, वस्तु एवं प्राणी हमें आकर्षित करते हैं. उनका आकर्षण अलग अलग लोगों को अलग अलग रूपों में प्रभावित कर सकता है जैसे किसान को उसकी लहलहाती फसल, माँ .को उसकी संतान, माली को उसका बगीचा, अध्यापक को उसके छात्र- छात्रा एवं मूर्तिकार को ऐसा पत्थर जो तराशने के लिए  अच्छा हो इत्यादि.        सजीव निर्जीव का यह आकर्षण उसी को आकर्षित करता है जिसको उसके संबंध में कुछ जानकारी या ज्ञान हो.  उदाहरण के लिए  जंगल में कोई औषधीय पौधा है उसके लिए कितने लोग देखते रहते हैं उनको वो पौधा कोई...

जीवन की सीख Jeevan ki Seekh Hindi poem

समय से जगना, समय से उठना,  समय से तुम सब काम करो. जीवन सफल हो जाए तुम्हारा जग में ऐसे काम करो. खाना पीना ठीक रखो अपना,  कभी न मदिरा पान करो. जिससे स्वास्थ्य ठीक रहे तुम्हारा,  सदा तुम ऐसे काम करो अपने अन्दर पहले झांको,  फिर दूसरे की बात करो. बुराई करना ठीक नहीं,  तुम न किसी की बुराई करो. जो चाहो निज मान बढ़ाना,  दूसरों का सम्मान करो. बनना चाहो प्रिय जो सबका,  मत किसी का अपमान करो. सच्चे के तुम साथ में रहना,  झूठे का मत साथ  करो. करे बुराई कोई तुम्हारी,  उसका भी सम्मान करो. जो भी पास तुम्हारे हो,  उसका ही रसपान करो. दूसरों की चीज देखकर,  मत मन को कभी उदास करो. खाली बैठकर तुम यूँ ही,  कभी न समय बर्बाद करो. कर्म किये बिना फल नहीं मिलता,  नित मन में ऐसा ध्यान धरो. बिना संघर्ष के कुछ नहीं मिलता,  संघर्ष से न डरा करो. कर्म कभी निष्फल नहीं होता,  कर्म का तुम गुणगान करो. निज देश का हित हो जिससे,  ऐसा तुम नित काम करो. भूल से भी कुछ गलत न हो. ऐसा ईश्वर से ध्यान धरो.

मानव जीवन में आस्था का महत्व MAANAV JEEVAN MEIN AASTHA KA MAHATV

 आस्था या विश्वास का मानव जीवन में बहुत अधिक महत्व होता है. इससे व्यक्ति के अन्दर सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे व्यक्ति को अपने कार्य में सफलता प्राप्त होने के अवसर अधिक रहते हैं.इसका मुख्य कारण यह होता है कि व्यक्ति जिसमें आस्था रखता है उससे व्यक्ति का वैचारिक तारतम्य जुड़ जाने से व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि हो जाती है और व्यक्ति को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में आसानी हो जाती है. इस तथ्य को समझने के लिए एक छोटे से उदाहरण का सहारा लेना अनुचित न होगा.  माना कि एक शिक्षक अपनी कक्षा में सभी विद्यार्थियों को समान रूप से पढ़ाता है. कुछ विद्यार्थी जिन्हें शिक्षक में आस्था है वे शिक्षक की बातें ध्यान पूर्वक सुनते हैं उन्हें पाठ आसानी से समझ में आ जाता है. इसके विपरीत जिन विद्यार्थियों को शिक्षक में आस्था नहीं है वे आपस बातें करते रहते हैं शिक्षक द्वारा पढ़ाये गए पाठ को ध्यानपूर्वक नहीं सुनते हैं. बाद में कहते हैं सरजी आपने जो पढ़ाया हमारी समझ में नहीं आया. पाठ समझ में न आने का कारण मेरे विचार से शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच ठीक से  तारतम्य स्थापित न होना रह...