संदेश

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मित्र

मित्र तुम्हारा वही है, जो सुख-दुःख मेँ दे साथ । ऐसा मित्र छोडो नहीँ, फिर न आवै हाथ ॥   सुख मेँ तो सब साथ देँ, दुःख मेँ देत न कोय । जो दुःख मेँ है साथ दे, सच्चा साथी होय ॥ सामने तो मीठा बोले, पीछे रोके काज । ऐसे मित्र को छोड दो, शीघ्र ही तुम आज ॥ अति के मीठे जनन को, ऐसे ही तू जान । जैसे तन मेँ शुगर बढे, देत कलेश महान ॥ जेब मेँ जब पैसे रहेँ, मित्र बहुत ह्वै जायँ । जब ढिँग पैसे न रहेँ, मित्र पास नहिँ आयँ ॥ सबल का सब साथ देँ, निर्बल का नहिँ कोय । जो निर्बल का साथ दे, सोई महान होय ॥ सोच समझ कर मित्र बना, तुझे हो ऐसा ज्ञान । अच्छा मित्र होता सदा, सभी सुखोँ की खान ॥

भोजन तथा स्वास्थ्य

चित्र
भोजन में  रखिए सदा, पौष्टिकता का ध्यान । गरिष्ठ भोजन नहिँ ठीक है, ऐसा तो हो ज्ञान ॥ ताजा भोजन जो करै, शुद्ध पियै अरु तोय । उसको तो फिर न कभी, रोग पेट का होय ॥ लहसुन और प्याज हो, भोजन में  भरपूर । स्वाद भी अच्छा रहे, रोग रहेँ सब दूर ॥    मुरगे की बोली से जाना, क्या तुमने संदेश ।  प्रातःकाल उठ जाने का, वह देता उपदेश ॥    प्रातःकाल ही जो उठे, और टहलने जाय । स्वास्थ्य लाभ उसको मिले, क्यों  न वह हरसाय ॥ ध्यान स्वास्थ्य का रख सदा, यह तो है अनमोल । देखभाल में तू कभी, मत कर टाल-मटोल ॥ अच्छे स्वास्थ्य के लिए,करते रहो कुछ काम । यदि आवश्यक हो तो, कर लो कुछ व्यायाम ॥ जो तू चाहे स्वास्थ्य भला, तो मेरा कहना मान । फिर तो सदा ही चाहिए, चेहरे पर मुस्कान ॥ यदि कोई चाहे कि उसका,स्वास्थ्य न होय खराब । फिर तो उसे नहिँ चाहिए,पीना कभी शराब ॥ जो चाहो अपना भला, तो मत पियो शराब । इससे तो सब ही गये, तन मन धन अरु आब ॥ प्रातःकाल जो उठहिं, सेवहिं  शुद्ध समीर । जीवन में  नहिं हो सके, उनको रोग गंभीर ॥

Guru

  गुरु दीपक लेकर हाथ मेँ,  सब मेँ ढूँढा जाय । तीन लोक नौ खण्ड मेँ, गुरु से बडा न पाय ॥ तू अज्ञानी है महा, गुरु ज्ञान की खान । सब कुछ दै जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ॥ जो तू चाहे की तुझे,  शीघ्र ज्ञान मिल जाय।  फिर क्या है तू सोचता, क्योँ नहिँ गुरु बनाय ॥ ईश्वर के तो रूँठते, गुरु  के पास तू जाय। जब गुरु ही रूँठ गया,  फिर है कौन सहाय ॥ मत तू ऐसा जान रे, गुरु को तुझसे बैर। पीट पीट कर भी सदा,  तेरी चाहत खैर॥ बाहर से हो अति कठोर, अन्दर कोमल होय। ऐसा गुरु ही तो सदा,  ज्ञान सिखावै तोय ॥  गुरु के गुन तौ अनंत हैँ,  जान सकै जो कोय। मुझ अज्ञानी से कहाँ,  इनका वरनन होय॥

ईश्वर

जग का ईश्वर एक है, सब प्राणिन मेँ व्याप्त। जन अपने अज्ञान वश, करेँ न उसको प्राप्त॥ ईश्वर का सच्चा भगत, जग मेँ वही कहाय। सकल जगत के प्राणिन पै, जो निज प्रेम दर्शाय ॥   ईश्वर की पूजा क्या, इसे न समझे कोय। जो मेहनत से काम करे, वही तो पूजा होय॥   ईश्वर के दर्शन करे, दीनन मेँ तू जाय। मानव सेवा मेँ सदा, ईश्वर को है पाय॥    अन्तःकरण को शुद्ध कर, ईश्वर का धर ध्यान। इससे सदा प्रसन्न रहेँ, तुझसे हैँ भगवान॥  हे ईश्वर मैँ तो सदा, दाता जानूँ तोय। जिसमेँ तो कल्यान हो, सो तू देना मोय॥ मैँ का तुझसे माँग लूँ, माँगन मेँ तो फेर । ज्ञान बुद्धि देना मुझे, मत कर देना देर ॥ अति सूक्ष्म व्यापक अति, वर्णन किया न जाय । जो जाने कह न सके, कहे सो जान न पाय ॥

श्री गणेशाय नमः

ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ  सुमर श्री भगवान को, लई लेखनी हाथ । दोहा रचने मेँ प्रभु, देना हरदम साथ ॥   दोहा रचने मेँ सदा, रखूँ गुरू का ध्यान। होऊँ सफल निज काम मेँ , ऐसा देँ वरदान ॥ मात-पिता भी देँ मुझे, ऐसा आशीर्वाद। रचना पूरी करने मेँ, सफल होय 'प्रसाद'॥   विद्या देवी सरस्वती, हुदय विराजेँ आन । दोहा रचना मेँ सदा, बना रहे सुर तान ॥ बार-बार सुमरूँ सबै, मत देना विसराय । शुभाशीष देना मुझे, काम सफल हो जाय॥

दो शब्द Do shabd

साहित्य को जीवन्त बनाने के लिए, साहित्यकार अनेक विधाओं को या विभिन्न विधाओं में से किसी एक विधा को अंगीकार कर, अपनी प्रतिभा से एक नया इतिहास रचते हैं और उनके विचारों से सभी  परिचित होते हैं | विचारों का आदान प्रदान नये विचारों को जन्म देता है जिससे समाज को नयी दिशा मिलती है।                 अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाने हेतु मैंने कविताओं  को विचार अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। कविताओं के इस संग्रह में  विभिन्न शीर्षकों के अन्तर्गत पुरानी एवं नयी कविताओं की रचना की गयी है। पाठकगण पुरानी एवं नयी कविताओँ का एक साथ आनन्द ले सकेंगे, ऐसी मेरी आशा है।                          कोई भी रचनाकार स्वयं को किसी भी रूप में  पूर्ण नहीं कह सकता है, अतः इस  संग्रह में भी त्रुटियाँ होना स्वाभाविक है। सभी पाठकोंसे मेरा अनुरोध है कि आप मेरा इस ओर ध्यान आकर्षित करेंगे, मैंआपका हृदय से आभारी रहूँगा।            ...

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प्रसाद कविता संग्रह में आप सभी का हार्दिक स्वागत है |