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ग़ज़ल Gazal

मुझे छोड़ कर तुम कहाँ जा रहे हो कहो तो सही क्यों न कह पा रहे हो पूंँछा जो मैंने तो कुछ न बताया फिर मन ही मन क्यों मुस्करा रहे हो कितने दिनों से बैठा हूँ इसमें कि कब आ रहे और क्या ला रहे हो बड़े ही अजीब बन गए हो अब तुम जो भी लाए हो उसे खुद खा रहे हो न जाने क्या मैंने देखा है तुम में जो रुख न मिलाते फिर क्यों भा रहे हो 

ग़ज़ल Gazal

कोई न हो जब करीब तब तुम मिला करो छोड़ो वो पिछली बातें अब न गिला  करो देखो ये दुश्मनों ने कितने दिए हैं जख्म अब तुम ही आ करके इनको सिला करो आई जो तुम तो आ जाए बहार फिर मेरी भी कुछ बात तुम मान लिया करो पतझड़ करीब हो ये लगता है मुझको गम दूर रहे हमसे तुम ऐसी खिला करो मिलना हो जब हमें ये सोचे रहना तुम तुम सुई हो मैं धागा तुम न हिला करो