ग़ज़ल Gazal
मुझे छोड़ कर तुम कहाँ जा रहे हो कहो तो सही क्यों न कह पा रहे हो पूंँछा जो मैंने तो कुछ न बताया फिर मन ही मन क्यों मुस्करा रहे हो कितने दिनों से बैठा हूँ इसमें कि कब आ रहे और क्या ला रहे हो बड़े ही अजीब बन गए हो अब तुम जो भी लाए हो उसे खुद खा रहे हो न जाने क्या मैंने देखा है तुम में जो रुख न मिलाते फिर क्यों भा रहे हो