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जून, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

समाज में परिवर्तन | Change in Society | Blog

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परिवर्तन प्रकृति का आवश्यक नियम है. प्रकृति में सदा कोई न कोई परिवर्तन होता ही रहता है. कोई भी परिवर्तन यकायक नहीं हो जाता है वरन् इसमें काफी समय लग जाता है. परिवर्तन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. कुछ परिवर्तन कम समय में हो जाते हैं जबकि कुछ परिवर्तनों में तो बहुत अधिक समय लग जाता है. प्रकृति की तरह ही मानव जीवन में भी परिवर्तन होता है. जिस प्रकार ऋतुओं में जाड़ा, गर्मी और बरसात आती है उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी बचपन, जवानी और फिर बुढ़ापा आ जाता है. मनुष्य के जीवन के तरह ही समाज में भी परिवर्तन होता है, इसे सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है. कोई भी सामाजिक व्यवस्था जो समाज में काफ़ी समय से चली आ रही है उसे गलत तो नहीं कहा जा सकता है. इसके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि प्रचलित सामाजिक व्यवस्था समयानुकूल नहीं है, इसमें सुधार की आवश्यकता है. वर्तमान भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण इस ओर एक सराहनीय कदम है. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , सरकार की एक अच्छी योजना है. समाज में लिंगानुपात में असंतुलन एक गंभीर समस्या है. समय पर इसपर  ध्यान नही ं दिया गया तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सक...

तना-तनी Tanaa-Tanee

प्रेमी और प्रेमिका में गरमा-गरमी हो गई किसी बात को लेकर दोनों स्मार्ट थे गर्व था दोनों को अपने डील-डौल पर गरमा -गरमी बढ़ती गई प्रेमी बौखला उठा बोला- मेरे पास बहुत लंबी तेज धार वाली तलवार है पता है तुम्हें प्रेमिका भी क्यों चुप रहती उसने कहा जी हाँ  पता है उस तलवार को  जिस म्यान में रखते हो वो तो मेरे ही पास है

नोंक-झोंक Nonk-Jhonk

एक बार छिड़ गयी बहस पति और पत्नी में पति ने पत्नी से कहा तुम्हें न खाना पकाना आता और न ही कपड़े पहनना कोई खाना, बाना ठीक नहीं है तुम्हारा कहाँ से सीखा ये सब कुछ पत्नी बोली तुमने अपने बारे में भी सोचा है कभी अपने काम-क्रीड़ा को लीजिए कैच लेने में उंगलियाँ दुखती हैं फील्ड में गये नहीं कि उल्टी शुरू कोई सैटिंग, बैटिंग नहीं विकेट भी जल्दी गिरता है तुम्हारा शुक्र है पड़ोसी का जो घर परिवार चल रहा है तुम्हारे भरोसे रहती फिर तो आज कुछ भी न होता

पर उपदेश कुशल बहुतेरे | Example is better than precept

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व्यक्ति को अपने, समाज और देश के विकास के लिए स्वयं को सुधारने की आवश्यकता है, दूसरों को उपदेश देने से काम नहीं चलेगा. दूसरों को उपदेश देने की परम्परा पहले से ही चली आ रही है. गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इस सम्बन्ध में रामचरितमानस  में लिखा है- पर उपदेश कुशल बहुतेरे  अर्थात दूसरों को उपदेश देने वाले लोगों की संख्या समाज में बहुत अधिक होती है. अब प्रश्न यह उठता है कि केवल दूसरों को अपना सुझाव दें और स्वयं उस बात पर अमल न करें तो क्या इच्छित कार्य सम्पन्न हो सकता है? मेरे विचार से ऐसा सम्भव नहीं है. इस संदर्भ में एक लघु कथा आपके साथ साझा कर रहा हूँ जिससे यह विचार आसानी से स्पष्ट हो जाएगा.  एक राजा था. राजा के मन में एक उत्तम विचार आया. राजा ने सोचा कि उसके और अन्य राजाओं के राज्य में भी पानी के तालाब सर्वत्र दिखाई देते हैं किन्तु उसने दूध का तालाब कहीं नहीं देखा है. यदि मैंने अपने राज्य में एक दूध का तालाब बनवा दिया तो मेरा यश दूर दूर तक फैल जाएगा और मैं अद्वितीय राजा हो जाऊँगा. ऐसा विचार कर उसने कुशल कारीगरों से एक सुंदर तालाब बनबाया. संध्या के समय अपने सम्पूर्ण  राज्य ...

टीवी और बीवी - TV and Beevi

क्या जमाना था!  जब  टीवी नहीं थी मेरे हस्बैंड पूरा धयान रखते देते भरपूर समय और प्यार कई बार बजाते बैण्ड कर देते मुझे खुश हंँसा-हँसा कर समय बदला घर में टीवी आई मानो दूसरी बीवी आई अब तो हस्बैंड का भी बज  गया बैण्ड एक बार को तो हो गये परेशान किन्तु फिर पूरा ध्यान और समय देने लगे टीवी को अब क्या था मैंने अपना रूप संवारा टीवी ने भी अपना रूप संवारा पर उस डाइन के सामने एक न चली मेरी क्योंकि अब वो हो गई  ब्लैक एण्ड व्हाइट से रंगीन अब इस सौत का मेरे हस्बैंड पर हो गया पूरा अधिकार बैण्ड बजाना तो रहा दूर मेरी ओर देखते भी नहीं हाय!  सत्यानाश हो जाय इस डाइन का इसने तो मेरी खटिया खड़ी विस्तर गोल कर दिया