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आकर्षण और प्रेम Aakarshan Aur Prem

पोथी पढ़ पढ़ जुग मुआ, पंडित भया न कोय | ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ||                                          कबीरदास जी  कबीर जी जैसे संत और महापुरुष ने प्रेम को इतना महान माना है तो मैं प्रेम को कितना महत्व देता हूँ यह अवर्णनीय है.  इसलिए इस संबंध जो भी कहा जाए वो कम ही होगा क्यूँकि प्रेम को समझना आसान नहीं है.      प्रकृति के सभी जड़ चेतन पदार्थ, वस्तु एवं प्राणी हमें आकर्षित करते हैं. उनका आकर्षण अलग अलग लोगों को अलग अलग रूपों में प्रभावित कर सकता है जैसे किसान को उसकी लहलहाती फसल, माँ .को उसकी संतान, माली को उसका बगीचा, अध्यापक को उसके छात्र- छात्रा एवं मूर्तिकार को ऐसा पत्थर जो तराशने के लिए  अच्छा हो इत्यादि.        सजीव निर्जीव का यह आकर्षण उसी को आकर्षित करता है जिसको उसके संबंध में कुछ जानकारी या ज्ञान हो.  उदाहरण के लिए  जंगल में कोई औषधीय पौधा है उसके लिए कितने लोग देखते रहते हैं उनको वो पौधा कोई...