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अनुभव experience

जीवन में निरन्तर चलने वाली प्रकिया है अनुभव इसका प्रारंभ होता जिज्ञासा से प्रयत्न भूल एवं सुधार आवश्यक अंग इसके एक ही कार्य को बार-बार करने से कार्य हो जाता सरल समय की होती बचत आती गुणवत्ता कार्य में परिणाम स्वरूप अनुभव प्राप्त व्यक्ति को काम मिल जाता शीघ्र अनुभव है ज्ञान का भण्डार आय का स्रोत एवं मानव जीवन के विकास का आधार

विविधा Vividha

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सदा प्रेम से तुम करो, सबसे वार्तालाप  | इससे समाज में बढे़, तुम्हारा मेल मिलाप || प्रेम तत्व सबसे बड़ा, इससे बड़ा न कोय | जो इसको समझे भला, क्यों न पंडित होय || को जाने किस बाल के, लिखो है कहा ललाट | जीवन में बन जाये कुछ, या रह जाय सपाट || माता-पिता चाहे भला, बालक करे विकास | ध्यान उस पर दें सदा, दूर हो या पास || जीवन में सफलता का, सबसे बड़ा है राज | काम को टालो नहीं, करो आज का आज || फिर फिर फिर तू क्या करे, फिर में तो है फेर | काम को पूरा कर अभी, बेर हो या अबेर  || ईश्वर सबका एक है, मानव में क्यों भेद | जात-पांत को देखकर, यही तो होता खेद || जो तू चाहे जगत में, तेरा हो सम्मान | तुझे न करना चाहिए, किसी का अपमान || चिंता चिता से बुरी है, तू चिंता कर नाय | चिता जरावै मरे को, यह तो जिंदा जराय || दुख में भी हंसते रहो, मत हो कभी उदास | जैसे कीचड़ में कमल, करता सदा विकास || कष्टों से तुम ना डरो, इनसे होय सुधार | ज्यों तपने के बाद ही, सोना पाय निखार || शीतल निर्मल जो बने, सबका प्रिय हो जाय | ज्यों पूनम के इन्दु को, देख सभी हरसाय || विनम्र जन तो विपत से, उसी भांति बच जाय | आंधी में कोम...

सामाजिक नीति Social Policy

 जो तू चाहे जगत में, तेरी फूले फुलवार | तो तुझको ना चाहिए, किसी से करना रार || जीवन में आते सदा, सुख दुःख दोनों तोय | जो चाहे अपना भला, दोनों में सम होय || जो तू चाहे जगत में, तेरा हो कल्यान | माता पिता और गुरू, सबका कहना मान || रक्षक ही जब हो भक्षक, तब हो कौन सहाय | फिर प्राणों के बचने का, नहीं कोई उपाय || जो तू चाहे जगत में, तेरा हो कुछ मोल | तो अपने ज्ञान चक्षु को, जल्दी लेना खोल || ज्ञानी होने का कभी, मत करना अभिमान | घट जायेगा जगत में, तेरा फिर सम्मान || मित्रों देखो जगत में, वह सुख से रह पाय | दूसरों की चीज को, देख न जो लुभयाय || दोस्ती और दुश्मनी, दूर से जो कर पाय | ऐसे व्यक्ति के जीवन में, कष्ट कभी न आय || संगत करना साधु की, दुर्जन का न साथ | पछतायेगा फिर कभी, माथे पै धर हाथ  || संगत का ऐसा असर, कभी न खाली जाय | जैसी संगत जाये तू, वैसा ही फल पाय || सज्जन तो बिगड़े नहीं, चाहे होय कुसंग | चन्दन पर विष ना चढ़े, लिपटें लाख भुजंग || दुष्ट न छोड़ें दुष्टता, लाख जतन कर कोय | ज्यों पकने के बाद भी, मिर्च न मीठी होय || दुर्जन से बचकर रहो, जो तुम चाहो खैर | इनसे भली न दोस्ती, और ...