क्रोध
क्रोध कभी मत कीजिए , बुद्धि का करे नास ।
बिन बुद्धि क्या कर सका , जग में कोई विकास ।।
क्रोध करना ठीक नहीं, यह न किसी को भाय ।
क्रोधी जन भी तो सदा , बाद में है पछताय ।।
जो कोई चाहे जगत में, सबका प्रिय हो जाय ।
क्रोध त्यागने पर ही , वह ऐसा कर पाय ।।
शांति के बिना तो कभी , क्रोध न जीता जाय ।
ज्यों पानी डाले बिना , आग न बुझने पाय ।।
रक्त चाप के रोग में ,क्रोध है बड़ा सहाय ।
ज्यों घी डाले आग का , जलना तेज हो जाय ।।
आग भी नहिं जला सके , जैसा क्रोध जलाय ।
क्रोधी जन का तो सदा , तन दुबला हो जाय ।।
क्रोध को सेवक रूप में, जो कोई ला पाय ।
उसके जीवन में यही , अनेक काम बनाय ।।
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