कौन आगे और कौन पीछे KAUN AAGE AUR KAUN PEECHHE

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    आपने खिलाड़ियों को दौड़ते हुए देखा होगा। इस दौड़ में जीत उसी की होती है जो दौड़ में आगे निकल जाता है। दौड़ जब लम्बी होती है तो धावक को ट्रैक (जिसमें खिलाड़ी दौड़ता है) के कई चक्कर लगाने पडते हैं। इस दौड़ में कौन आगे निकल जायेगा कुछ कहा नहीं जा सकता है। कभी कोई आगे और कभी कोई आगे यह सब चलता रहता है। अन्त में जो सबसे आगे निकल जाता है जीत उसी की होती है। 
                मनुष्य का जीवन भी एक लम्बी दौड़ की तरह है। जीवन की इस दौड़ में हर कोई आगे निकलने का प्रयास कर रहा है। दर्शक-समाज को कभी कोई आगे निकलता दिखाई देता है और कभी कोई। इस दौड़ में, हमें जिससे आत्मीयता होती है उसे आगे निकलता देखकर हम खुश होते हैं और दूसरा कोई आगे निकलता है तो हम उदास हो जाते हैं। यह मानव स्वभाव है। 
                   ईश्वर ने हमें बहुत कुछ दिया है लेकिन सबकुछ नहीं दिया है। किसी को ज्ञान दिया है तो उसे धन नहीं दिया। किसी को स्वर दिया है तो उसे सुन्दरता नहीं दी। ईश्वर ने जो कुछ भी किया है हमारे भले के लिए किया है। उसने ना हमें कोई सजा दी है और ना कोई उससे भूल हुई है। हमें ईश्वर को धन्यवाद कहना चाहिए क्योंकि उसने जो कुछ भी किया है उसी में हमारी भलाई है। हमारी इस अपूर्णता के कारण ही हम एक दूसरे के काम आते हैं और इसी से समाज चलता है। 
                  किसी एक बात को आधार मानकर किसी के बारे में कुछ कह देना सर्वथा उचित नहीं है। विद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के उदाहरण द्वारा इस बात को स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं। 
                  सभी विद्यार्थियों का मानसिक स्तर समान नहीं होता है। कुछ विद्यार्थी पढ़ने लिखने में बहुत होशियार होते हैं, कछ सामान्य जबकि कुछ विद्यार्थी पढ़ने लिखने में बहुत अधिक कमजोर होते हैं। 
               सर्वप्रथम होशियार विद्यार्थियों को समझने का प्रयास करते हैं। ये विद्यार्थी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए होते हैं। ऐसे विद्यार्थी हाईस्कूल या इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण करके अपनी नौकरी के लिए प्रयास करने लगते हैं और इन्हें शीघ्र ही सफलता भी मिल जाती है। सर्विस मिलने के बाद या तो इन्हें आगे की पढ़ाई के लिए समय नहीं मिलता है या फिर ये आगे की पढ़ाई करना नहीं चाहते हैं। जो कुछ भी हो ये और आगे नहीं बढ़ पाते हैं और यहीं पर सिमट कर रह जाते हैं। 
                 मध्यम श्रेणी के विद्यार्थी भी इन प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित हुए थे किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। इस कारण उनकी आगे की पढ़ाई जारी रही। धीरे धीरे उनकी उच्च शिक्षा भी पूर्ण हो जाती है। अब वे उच्चस्तरीय परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और उनमें सम्मलित होते हैं। मरता क्या नहीं करता। वेरोजगारी की मार और बार बार प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित होने का अनुभव उन्हें किसी तरह एक दिन सफलता के द्वार तक पहुँचा देता है और उनको कोई अच्छी नौकरी मिल जाती है। 
               अब बात आती है ऐसे बालकों की जो पढ़ाई में भले ही ज्यादा अच्छे न हो किन्तु पाठ सहगामी क्रियाकलापों में रुचि लेते हैं। ये बालक अभिनय खेलकूद, भाषण आदि क्रियाकलापों में अधिक सक्रिय रहते हैं और इन्ही क्षेत्रों में आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। अभिनय में रुचि लेने वाले बालक-बालिका आगे चलकर फिल्म उद्योग में चले जाते हैं और अभिनेता अथवा अभिनेत्री बन जाते हैं। खेलों में रुचि लेने वाले खिलाड़ी और बोलने में चतुर बालक आगे चलकर नेता बन जाते हैं। 
                 आज के इस आपाधापी के समय में हर इंसान आगे निकलने का प्रयास कर रहा है। आगे निकलने के अनेक रास्ते हैं। कोई भी व्यक्ति किस रास्ते को चुनकर आगे निकल जाता है यह उसका विवेक और उसकी रुचि एवं उसकी मेहनत है। कब कौन आगे निकल जाये और कब कौन पीछे हो जाये कुछ कहा नहीं जा सकता है। किसी ने ठीक ही कहा है समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता है। 

     
      

             
                 
        
    कमैंट्स