गैर बने अपने GAIR BANE APNE

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    समय के साथ साथ हमारे जीवन में बदलाव होता रहता है। परिस्थितियां बदलती हैं तो हमारी विचाधारा भी बदल जाती है। जो व्यक्ति हमें बुरा लगता था  परिस्थितियों वश वही व्यक्ति हमें अच्छा लगने लगता है। जिंदगी भी अजीब है इसमें कब कौन सा मोड़ आ जाये निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस संघर्षपूर्ण जीवन में मनुष्य जीवन पथ के मोड़ों से गुजरते हुए आगे बढ़ता रहता है। यही जिंदगी है। 
                एक आम आदमी के मन में अपने-पराये, मित्र-शत्रु की सोच होती ही है लेकिन जिस इंसान का आत्मिक विकास हो गया हो या यूँ कहें जिसमें समता का भाव आ गया हो उसके लिए तो सभी अपने होते हैं कोई पराया नहीं होता है। ऐसा इंसान अपने जीवन में सदा सुखी रहता है । लेकिन ऐसे इंसान समाज में बहुत कम होते हैं। 
                इस लेख में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि किन कारणों से गैर भी अपने बन जाते हैं और उनका हमारे प्रति पहले से अच्छा बर्ताव हो जाता है।
                आज के इस भौतिकवादी युग में हर भलाई बुराई की जड़ पैसा है। जहाँ आदमी का स्वार्थ एक दूसरे से टकराता है वही ं एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं दूसरी ओर जो आदमी जिसके हित की बात करता है वो उसका अपना बन जाता है। 
                आदमी के पास जैसे-जैसे पैसा बढ़ता जाता है उसको अपना मानने वाले बढ़ते जाते हैं। दूर के नाते रिश्तेदार भी अब आना जाना अधिक करने लगते हैं। कोई अवसर हो निमंत्रण अवश्य भेजते हैं और आने के लिए विशेष आग्रह करते हैं। जिन लोगों से कभी मिलना- जुलना भी नहीं होता था वो भी धीरे धीरे करीब आने लगते हैं।
                  जब कोई व्यक्ति बड़ा पदाधिकारी बन जाता है तब उसके विरोधी भी उसका विरोध करने के बजाय उसका गुणगान करने लगते हैं और उसके पास बैठकर चिकनी चुपड़ी बातें करने लगते हैं। अब वे उसके दोषों की ओर से मुंह मोड़ लेते हैं उन्हें उसमें कोई दोष दिखाई नहीं देता है। 
                  भारतीय राजनीति में भी कुछ ऐसा ही है। विपक्ष के नेता भी अपना हित साधने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी में शामिल हो जाते हैं। जिस पार्टी की रात दिन बुराई करते थे वो पार्टी उन्हें अब अच्छी लगने लगती है। 
                 किसी ने सत्य कहा है- दुनिया मतलब की है। आदमी का कोई मतलब हो तो वो जिसे गैर समझता है उसे भी अपना बना लेता है। अपना मतलब निकालने के लिए वो किसी भी हद तक गिर सकता है। जिसके लिए हमेशा कोसता रहता था अब उसके साथ प्रेम का बर्ताव करने लगता है और किसी तरह अपना उल्लू सीधा कर लेता है। 
                  इंसान के जीवन में सुख हो तो उसे बहुत कम दूसरों की याद आती है। लेकिन जब उसके जीवन में दुख आ जाता है तो जिनको वो भूला पड़ा था वो भी उसे याद आने लगते हैं। सोचता है, किसी से भी मदद मिल जाती तो मेरा काम चल जाता।ऐसे समय गैर भी उसकी मदद कर दे तो वो उसका अपना बन जाता है। 
                  सहयोग और संघर्ष समाज की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। समाज में हम एक दूसरे का साथ देते हैं किन्तु किसी बात को लेकर आपस में कहासुनी भी हो जाती है। कहावत है जहाँ चार बर्तन होते हैं खटकते ही हैं। ऐसा देखा गया है कि किसी एक आदमी का दो अलग अलग लोगों से झगड़ा चल रहा हो और सयोग वश वे कभी मिल जायें तो दोनों उसकी बुराई करने लगते हैं। दोनों में मेलजोल बढ़ जाता है और अब वे एक दूसरे के दोस्त बन जाते हैं। 
                 समाज में हम जिन लोगो के साथ अधिक रहते हैं या जिनसे हमारी घनिष्ठता है उन्ही से हमारी कहासुनी हो जाती है और मनमुटाव हो जाता है। जिससे कोई मतलब नहीं उससे झगड़ा क्यों होगा? जिससे कोई कहासुनी नहीं, कोई झगड़ा नहीं, ऐसा इंसान हर किसी को अच्छा ही लगेगा। दूर के ढोल सुहावने लगते हैं कहावत यहाँ भी सही लगती है। 
                इंसान का प्रेमपूर्ण व्यवहार हर किसी को अपना बना लेता है इसमें कोई दो राय नहीं है। 
        
                  
               

       
    कमैंट्स