मैंने कब कहा MAINE KAB KAHAA

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    हम जब भी किसी के साथ बैठते हैं तो आपस में कुछ न कुछ बात अवश्य करते हैं। इन बातों का सिलसिला यूँ ही नहीं चलता है। कभी अपने बारे में तो कभी दूसरों के बारे में बातचीत होती है। आज हम कहने सुनने की कला को समझने का प्रयास करेंगे। 
              मनुष्य एक सामजिक प्राणी है। समाज से ही हम अच्छी बुरी हर प्रकार की बातें सीखते हैं। सीखने का यह क्रम जीवन भर चलता रहता है। ऐसा देखने में आया है कि किसी काम के बिगड़ जाने पर उसकी जिम्मेदारी कोई लेना नहीं चाहता है और काम बन जाने पर उसका श्रेय सभी लेना चाहते हैं। 
               अपनी कही हुई बात को स्वीकार न करना भी झूठ बोलने का एक तरीका है। जब बात कहीं फँस जाती है तो लोग अक्सर यही कहते हैं- मैंने कब कहा और अपनी कही हुई बात से मुकर जाते हैं तथा अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। 
                झूठ बोलना, आज एक आम बात है। कभी इंसान अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए तो कभी मनोविनोद के लिए झूठ बोलता है। झूठ का नमक डाले बिना बातचीत की सब्जी में स्वाद नहीं आता है। सच बोलने से सुनने वाला नाराज होता हो तो झूठ बोलकर उसे खुश कर देने में मेरे विचार से कोई बुराई नहीं है। 
               दो लोग बात कर रहे हों तो किसी और के बारे में भी चर्चा होने लगती है ऐसा अक्सर होता है। ऐसे में निसंकोच दोनों ही उसके बारे में खुलकर बातें करने लगते हैं। इस समय वे उसकी अच्छाई की कम और बुराई की अधिक चर्चा करते हैं। इनमें से एक साथी आपस में की गई बात में कुछ अपनी ओर से झूठ जोड़कर उसके खिलाफ भड़का देता है और उन दोनों में झगड़ा करा देता है। बात बढ़ जाती है और पूछताछ होती है तो मैंने कब कहा कहकर अपना पल्ला छुड़ा लेता है। 
                 अपनी कही हुई बात से जब कोई मुकरता है तो ऐसा लगता है कि उसे खूब भला बुरा कहे और उससे मतलब न रखे। लेकिन वो बड़ी चतुराई से यह समझा देता है मैंने ऐसा नहीं कहा था तुम्हारे समझने में गलती हो गई होगी। 
             गलती किसी से भी हो सकती है। गलती करने वाला यदि अपनी गलती मान लेता है तो वो एक भला आदमी है। गलती के लिए मुझे खेद है, मुझे क्षमा करें। ऐसा कह देता है तो और अच्छा है। लेकिन ऐसे लोग समाज में कम होतें है ं। 
              लोगों की सोच कुछ ऐसी बन चुकी है कि उनसे गलती हो भी जाए तो भी उसे मानने को तैयार नहीं होते हैं उनका मानना है कि गलती मान लेने से हम मूर्ख समझे जायेंगे और हमारा मान सम्मान कम हो जायेगा। इसलिए अपने बचाव में अनेक बातें समझाते हैं और गलती नही मानते हैं। 
              जब भी किसी ने कुछ गलत कह दिया हो या उसकी कुछ गलती हो तो बहुत अधिक उसके पीछे नहीं पड़ना चाहिए। उससे बहुत अधिक कहना सुनना अधमरे को मारने के समान होता है। झुंझलाहट में वो कोई भी कदम उठा सकता है और आपसे भला बुरा कह सकता है । उसके पास अपने बचाव के लिए ' मैंने कब कहा 'कहना ही काफी है। 
       


                
       
             
               

    कमैंट्स