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मतलब की दुनिया # MATALAB KI DUNIYA # BLOG

'दुनिया मतलब की है।'इस कहावत ने मतलब शब्द को इतना बदनाम कर दिया है कि मतलब के बारे कुछ लिखने से पहले सोचना पड़ रहा है कि कहीं लोग मुझे मतलबी न समझ बैठें। सोचा जाय तो हर इंसान मतलबी होता है। किसी को मतलबी कहने पर न जाने उसे गाली क्यों लगती है। हो सकता है हम सब मतलब का भी गलत मतलब निकाल लिए हों।           वैसे तो हर किसी बात का कोई न कोई मतलब होता है और बिना मतलब की कोई बात नहीं होती है। जब हम किसी संदर्भ से हटकर बात करने लगते हैं तो वो बेमतलब की बात हो जाती है। ऐसी बात को सुनने वाला कोई महत्व नहीं देता है। वही बात ठीक लगती है जो कहने वाले और सुनने वाले दोनों के मतलब की हो। केवल अपने मतलब की बात करने वाले को मतलबी कहा जाता है।         जब हम किसी से बात करते हैं और वो हमारी बात का अर्थ नहीं समझ पाता है तब हम मतलब कहकर दूसरे सरल शब्दों में अपनी बात समझाने का प्रयास करते हैं, ऐसा अक्सर होता है। कुछ लोगों की तो आदत ही ऐसी हो जाती है कि वे अपनी हर बात में मतलब जोड़ देते हैं। जो इंसान बिना मतलब के अपनी बात नहीं कह पा रहा है उसे आप क्या कहें...

एक पुराने पेड़ की आत्मकथा EK PURANE PED KI ATMKATHA

मेरा जन्म किसी पौधशाला में नहीं हुआ। घरवालों का मानना है कि फल का कोई बीज किसी तरह दीवार के सहारे मिट्टी में दबा रहा वही पर एक नन्हें पौधे की मुस्कान दिखाई दी। ऐसा देखकर सभी आश्चर्यचकित और प्रसन्न हुए। किसी ने ठीक ही कहा है 'जाको राखे साईंया मार सके ना कोय'। बात भी सही है यहाँ पर पौधा उगने के लिए कोई  खास जगह नहीं थी। किन्तु ईश्वर की कृपा से सब सम्भव है। ईश्वर असम्भव को भी सम्भव बना देते हैं। कबीर दास जी ने भी इस बात को स्वीकार किया है तभी तो  कहा---साहब से सब होत है बन्दे ते कुछ नाहिं। राई ते पर्वत करे पर्वत राई माहिं।।            समय बीतता गया अब मुझमें अनेक पत्तियाँ निकल आयीं। घरवाले खुशी खुशी बड़े मनोयोग से सदा मेरी देखभाल करते रहते थे किन्तु उन्हें एक चिंता सदा सताती रहती थी कि मेरे बड़ा होने के लिए उचित और पर्याप्त जगह नहीं थी। घरवाले मेरा पालन पोषण एक बच्चे की तरह कर रहे थे। मैं उनके घर में अकेला फल का पौधा था जो उन्हें ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुआ था। उचित देखभाल के परिणामस्वरूप मेरी बढ़वार अच्छी हो रही थी। अब हर हालत में उन्हें मुझे दूसरी...

अनुकूलन और हम ANUKOOLAN AUR HAM

 मैं कोई विद्वान या भाषाविद नहीं हूँ जो मैं आपको अनुकूलन शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में समझाऊँ कि यह शब्द किन किन शब्दों से मिलकर बना है और यह विशेषता किस अर्थ में प्रयोग किया जाता है। मैं तो  केवल इतना जानता हूँ कि जब कोई परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को  बना या ढाल लेता है तो यह कहा जायेगा कि उसने अनुकूलन कर लिया है।              अनुकूलन की प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया होती है इसमें जीव को बहुत संघर्ष करना पड़ता है। इसमें जीवों को प्रतिकूल परिस्थितियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है। इस समयावधि में जो जीव परिस्थितियों के साथ संघर्ष करके अनुकूलन नहीं कर पाते हैं  उनका जीवन बहुत ही कष्टदायी होता है या फिर वे नष्ट ही हो जाते हैं। कुछ जीवों में अनुकूलन काफी लम्बी समयावधि में हो पाता है ऐसे में उनका रंग रूप और आकार भी  बदल जाता है।            वृक्षों को आपने देखा होगा। कुछ वृक्ष सदा हरे भरे रहते हैं जबकि कुछ वृक्ष पतझड़ ले लेते हैं। जो वृक्ष जलवायु के साथ अनुकूलन कर लेते हैं वे सदा हरे भरे बने रहते हैं ...

व्यस्त रहो मस्त रहो #VYAST RAHO # MAST RAHO# BLOG

मानव जीवन में व्यस्तता बहुत जरूरी है। अंग्रेजी में कहावत है - 'Empty miind is devil's workshop. ' खाली दिमाग शैतान का घर होता है । अर्थात खाली बैठे आदमी का शरीर भले ही नहीं चल रहा हो किन्तु उसका दिमाग सदा चलता रहता है। ऐसे आदमी के मन में जैसे विचार आयंगे वैसा ही काम वो करेगा।            आपने अपने घर में बच्चों को तो देखा ही होगा। बच्चे एक जगह शांतिपूर्वक नहीं बैठते हैं। वे सदा इधर उधर कुछ न कुछ उलट-पलट और छेड़छाड़ करते रहते हैं। घर में रखे सामान की तोड़-फोड़ करना और काम विगाड़ना उनके लिए सामान्य बात है। इसका मुख्य कारण यह होता है कि वे कोई काम करने लायक तो हैं नहीं जिसमें वे व्यस्त रहें अत: उनके मन में कुछ न कुछ विचार आते रहते हैं और वे  वैसा ही करते रहते हैं। उनका सही गलत से भी कोई मतलब नहीं होता है।             काम करने वाले आदमी का समय आसानी से व्यतीत हो जाता है। समय कब बीत गया उसे पता ही नहीं चलता है।काम पूरा हो जाने पर उसको सुख की अनुभूति होती है क्योंकि व्यक्ति का कोई भी कार्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसके जी...

मानव जीवन में संतुलन और सुख का सम्बन्ध MAANAV JEEVAN MEIN SANTULAN AUR SUKH KA SAMBANDH

हम सभी अपने जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं। जीवन को सुखी बनाने के लिए हम सभी प्रयासरत रहते हैं। यदि किसी से बात करें तो वो अपने जीवन से जुड़ी अनेक समस्याएं गिना देगा जिनसे वो दुखी है। कोई गरीबी से दुखी है तो  कोई अमीरी से। आप सोचते होंगे अजीब बात है अमीरी में तो आनन्द ही आनन्द है। अमीर लोगों को कोई दुख नहीं होता है। वास्तव में ऐसा नहीं है। उनका दुख दूसरे प्रकार का दुख होता है। उन्हें सदा अपने कारोबार की चिंता सताती रहती है कि कहीं कोई घाटा हो जाय।          आज के इस भौतिकवादी युग ने मनुष्य के जीवन से उसका सुख हर लिया है। आज का आदमी अधिक से अधिक वस्तुओं का उपयोग करके अपने जीवन को सुखी बनाने का प्रयास कर रहा है। अपने पड़ोसी के पास ऐसी वस्तु देखकर जो उसके पास नहीं है  बहुत दुखी होता है जब कि उसको कोई दुख नही ंं है।          सुख-दुख का सम्बन्ध मनुष्य के विचार और उसकी मानसिकता से है। सकरात्मक सोच वाला व्यक्ति सुखी रहता है । नकरात्मक सोच वाले व्यक्ति को हर चीज में कमी दिखाई देती है और वो दुखी रहता है। कुछ लोगों की ऐसी सोच होती कि ...

सुन्दर कैसे बनें SUNDAR KAISE BANE

सुन्दरता व्यक्ति के चरित्र का एक आवश्यक गुण होता है। सुन्दर व्यक्ति हर किसी का मन मोह लेता है। सुन्दरता से कौन प्रेम नहीं करता है इसीलिए हर कोई सुन्दर बनना चाहता है। अब प्रश्न उठता है कि सुन्दर कैसे बना जाय, इसी विषय के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करने का मेरा विचार है। सुन्दरता दो प्रकार की होती है- पहली वाह्य सुन्दरता और दूसरी आन्तरिक सुन्दरता। वाह्य सुन्दरता से मेरा अभिप्राय शारीरिक सुन्दरता से तथा आन्तरिक सुन्दरता से मेरा तात्पर्य आचरण की सुन्दरता से है। अब इन दोनों प्रकार की सुन्दरताओं को समझने और उनको प्राप्त करके सुन्दर बनने का प्रयास करते हैं।          पहले हम शारीरिक सुन्दरता की बात करते हैं। वैसे तो शारीरिक सुन्दरता जन्मजात होती है, सुन्दर माता-पिता के बच्चे भी सुन्दर ही होते हैं। शारीरिक सुन्दरता प्राप्त करने के लिए हमें बहुत अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता है क्योंकि बच्चे का  रंग-रूप अधिक -तर अपने माता- पिता जैसा ही होता है। शरीर के रंग में तो हम बहुत अधिक परिवर्तन नहीं ला सकते हैं, हाँ इतना अवश्य है कि स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें तो शरीर के...

आप भला तो जग भला AAP BHALAA TO JAG BHALAA

समाज में अनेक प्रकार के लोग होते हैं। उन सबको समझ पाना और उनके बारे में कुछ कह पाना बड़ा ही मुश्किल कार्य है। उसका कारण यह है कि किसी एक ही विषय पर लोग एक मत नहीं हो पाते हैं, सबकी सोच और सबके विचार अलग -अलग होते हैं। फिर समाज में इतने अधिक लोग और उनके अनेक प्रकार के विचारों को समझना नामुमकिन है।            विषय को समझने की दृष्टि से समाज के सभी लोगों को तीन श्रेणियों में विभाजित कर लिया है । पहली श्रेणी में वे लोग आते हैं जो अपने जीवन में सदा दूसरों की भलाई के लिए कार्य करते हैं। ये लोग तन, मन और धन से सदैव दूसरों का हित करते हैं। ये संत स्वभाव के लोग होते हैं। ऐसा कहा गया है--परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर। इनकी संख्या समाज में कम होती है।            दूसरी श्रेणी में ऐसे लोग आते हैं जो अपने जीवन में अपना हित करने के साथ -साथ दूसरों का हित भी चाहते हैं। इनका विचार होता है कि हमारा अहित न हो, यदि किसी का भला हो जा रहा है तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। इस प्रकार की सोच वाले लोग सज्जन कहलाते हैं। समाज में इस प्रकार के लोग काफी संख्...

सफलता प्राप्ति में धैर्य और समय का महत्व SAFALTAA PRAAPTI MEIN DHAIRYA AUR SAMAY KA MAHATV

जब हम किसी लक्ष्य में सफलता प्राप्त करने की बात करते हैं तो हर कोई सबसे पहले मेहनत को वरीयता देता है। बात भी सही है, बिना मेहनत किये कोई भी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है। यदि कोई व्यक्ति अपने काम में असफल हो जाता है तो एक सामान्य व्यक्ति भी बिना सोचे समझे सीधी सादी सबके द्वारा कही गई बात को कह देता है  'मेहनत नही ं की तो सफलता कैसे मिलती '।              'परिश्रम सफलता की कुंजी है'। यह कथन सर्वथा सत्य है, इसे नकारा नहीं जा सकता है। मैंने अपने जीवन में अनेक लोग ऐसे भी देखे हैं, जहाँ तक मेरी जानकारी है उन्होंने अपने काम में भरपूर मेहनत की। मेहनत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। बेचारे इसी आशा में रहते कि सफलता का स्वाद उन्हें भी चखने को मिल जाए किन्तु उनके मुंह में सफलता का स्वाद चखने के लिए आयी लार ज्यों की त्यो ं रह जाती।               लोग कहते हैं -'धैर्य का फल मीठा होता है'। अक्सर लोग मतलब की बात समझ लेते हैं किंतु बात का मतलब या तो समझने की कोशिश नहीं करते या उनकी समझ में नहीं आता है। संघर्ष क...

सत्य की खोज SATYA KI KHOJ

आज मैं जिस बिषय पर लिखने जा रहा हूँ उसका कोई आदि और अन्त नहीं है.जब किसी वस्तु का कोई सिर पैर ही नहीं हो तो अपनी बात कहाँ से शुरू की जाये कुछ समझ नहीं आ रहा है फिर भी अपनी बात तो कहनी ही है.          जब हम कोई नयी खोज करते हैं तो उसके लिए हमें अनेक बार प्रयास करना पड़ता है क्योंकि कि कोई भी सफलता हमें आसानी से प्राप्त नहीं होती है। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं होता है कि हम प्रयास करना बंद कर दें और हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाये ं।          हम अपने काम में यदि असफल भी जाते हैं तो भी हमें यह सीख अवश्य मिलती है कि हमसे कहीं चूक हुई है और हम दूसरी तरह अपना प्रयास करते हैं। हमें अपने प्रयास से कुछ न कुछ सीखने को अवश्य मिलता है। हमारा प्रत्येक प्रयास हमें सफलता के निकट ले जाता है, इसीलिए असफलता को सफलता तक पहुँचने की सीढ़ी कहा जाता है। मानव जीवन के इतिहास में जितनी भी खोजें हुई हैं वे सब लम्बे संघर्ष और प्यास का परिणाम हैं।          विज्ञान इस बात को मानता है कि कोई भी वस्तु न तो नये सिरे से उत्पन्न की जा सकती है और न ...

नानी का घर NAANee KA GHAR

 मेरी नानी का घर गाँव में है। गाँव का नाम सुनते ही एक बार फिर आपके मन में गाँव का पुराना दृश्य जरूर आया होगा। गाँव में सुविधाओं का अभाव, गंदगी के ढेर और कच्चे मकान होना ये सब आम बात थीं। शहर के लोग तो गाँव का नाम सुनते ही डर जाते थे। गाँव में जाना और वहाँ से रिश्ता करना उन्हें कदापि मंजूर नहीं था। इतना सबकुछ होते हुए भी शहर के लोग गाँव की कुछ बातों की प्रशंसा भी करते थे जैसे-  बिना मिलावट का दूध-घी ,ताजा फल और सब्जियां, गन्ने का ताजा रस और गरम -गरम ताजा गुण इत्यादि।            गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि होता है। मेरे  नाना जी भी खेती करते हैं।। वो अपने खतों में मुख्य रूप से धान, गेहूँ ,मक्का, चना , मूंगफली और गन्ना की फसलें करते हैं। मैं जब भी नानी के घर जाता तो अपने मामाजी के साथ खेतों पर घूमने अवश्य जाता था। खेतों में लहलहाती फसलों को देखकर मेरे आनंद का कोई ठिकाना नहीं रहता था। चना और मूंगफली के गरम- गरम होले मुझे बहुत अच्छे लगते थे। नानाजी गन्ने से गुड़ भी बनाते थे। मैं जब भी जाड़े की छुट्टियों में नानाजी के यहाँ जाता तो गरम गरम ग...