जाने दो JANE DO
सजीव का एक लक्षण संघर्ष करना भी है। जो संघर्ष कर रहा है उसी का जीवन वास्तव में जीवन है। घर परिवार और समाज में आये दिन कोई न कोई ऐसी बात हो जाती है जिसको लेकर आपस में कहा सुनी हो जाती है और बात का बतंगड़ हो जाता है। कभी तो बात रफा दफा हो जाती है और कभी कभी यही बात इतनी बढ़ जाती है कि झगड़े का रूप ले लेती है। झगड़ा हो जाने पर दोनों ही पक्षों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे समय में हमें क्या करना चाहिए यह विचारणीय प्रश्न है?
'जाने दो' सामाजिक जीवन से जुड़ी समस्याओं का आदि और अन्त दोनों ही है। जीवन में आये दिन कोई न कोई घटना होती रहती है। इन घटनाओं का हमारे जीवन से सम्बन्ध होता है। ये हमारे जीवन को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी न किसी रूप में प्रभावित करती हैं। कोई घटना ऐसी होती है जिस पर ध्यान न दिया जाये तो बात वही ं रफा दफा हो जाती है और बात का बतंगड़ नहीं बनता है। इससे दोनों पक्षों का जीवन सहज हो जाता है, उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती है।
हमारे जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी भी होती हैं जिनका समय रहते समाधान नहीं किया गया तो आगे चलकर एक ऐसी समस्या बन जाती है जिससे बाहर निकलना व्यक्ति के लिए मुश्किल हो जाता है। इसलिए यहाँ इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लेना जरूरी है कि न तो हर किसी बात को टालना चाहिए और न हर बात को लेकर किसी के पीछे पड़ने की जरूरत है। ऐसे समय में आपको अपने विवेक से काम करना है। जिस बात से आपके ऊपर कोई गलत प्रभाव नहीं पड़ रहा है उसे अनावश्यक अपने ऊपर न लें। हर किसी बात को अपने ऊपर लेना कोई समझदारी का काम नहीं है। ऐसी बात को टाल देने में ही आपकी भलाई है।
देश, काल और परिस्थितियां हमारे जीवन को प्रभावित करतीं हैं। सामाजिक परिवर्तन में इनकी अहमं भूमिका रहती है। व्यक्ति की सोच भी सदा एक जैसी नहीं रहती है। समय और परिस्थितियों के अनुसार उसमें बदलाव होता रहता है। इसलिए किसी एक बात को सदा के लिए सही अथवा गलत नहीं ठहराया जा सकता है। आज जो हमें सही लग रहा है हो सकता है आने वाले समय में हमें यही गलत लगने लगे।
प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव और उसकी सोच भिन्न भिन्न होती है। कोई व्यक्ति किसी बात को लेकर अतिशीघ्र क्रोधित हो जाता है जबकि दूसरा व्यक्ति इसी बात को हंसकर टाल देता है। इसलिए किसी एक बात के लिए हर किसी के लिए सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता है।
अपनी बात पर अड़े रहना भी कोई समझदारी नहीं है। हमारे जीवन की अधिकतर समस्याओं की जड़ हमारा अड़ियल स्वभाव ही है। हम सदा दूसरे को गलत और स्वयं को सही मानते हैं। एक सही है ,दूसरा गलत हो ,जरूरी नहीं है। दोनों के कहने समझने का तरीका भिन्न भिन्न हो सकता है। एक उदाहरण से इस बात को समझने में सरलता होगी। एक व्यक्ति कहता है - -- 2 को 2 से गुणा करने पर 4 आता है। दूसरा कहता है---- 2 में 2 जोड़ने पर 4 आता है। इसमें दोनों की बात सही है। कहने और समझने का तरीका भले ही अलग है।
हमारे दैनिक जीवन में भी अधिकतर विवाद अहमं की भावना के कारण होते हैं या इनके पीछे ना समझी होती है। अधिकतर लोगों की सोच ऐसी होती है कि दूसरे की बात मान लेंगे तो हम छोटे हो जायेंगे और अपने को बड़ा बनाने के चक्कर में व्यर्थ का तनाव मोल लेते हैं।
मानसिक तनाव मनुष्य के जीवन को बर्बाद कर देता है। सहजता में ही जीवन का आनंद है। जीवन में अनावश्यक तनाव से बचने के लिए किसी भी बात को हंसकर टाल देना चाहिए। सामने वाला जो भी समझे किसी की डींग भरी फिजूल की बातें सुन लेने से हम छोटे नहीं हो जाते हैं।
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